Tuesday, 2 January 2018

सुरत निरत के भेद

ISSN 2249-5967   सुषमा शर्मा सम्पादक SEARCH Toggle navigation सुरत निरत के भेद CATEGORY : आवरण 01-Jun-2016 12:00 AM 810 कभी-कभी लगता है कि इतिहास तो अपनी गति से आगे बढ़ता चला गया है, लेकिन हम वहीं के वहीं खड़े रह गए हैं, जहां थे। है तो यह विडम्बना ही। इक्कीसवीं सदी की पन्द्रहवीं ¶ाताब्दी के युग से तुलना। लेकिन लगता है, कुछ-कुछ ऐसे ही दिन रहे होंगे, जब एक जुलाहे ने समाज की एक नई बुनावट का सन्दे¶ा देने का - उसकी, व्यामोह की नींद तोड़ने का बीड़ा उठाया होगा। चारों ओर कुछ ऐसा ही ¶ाोर रहा होगा, जब अपने-अपने मतवाद का ढिंढोरा पीटने वालों की लगभग अराजक भीड़ें अपनी आवाजों से ¶ोष सभी स्वरों को दबा देने का प्रयास कर रहे होंगी, वि¶ोष रूप से उन प्रतिवादी स्वरों को, जो इस बेसुरे कोलाहल में कुछ सुरताल वाली बात कहने का जतन कर रहे होंगे। उस समय का जितना इतिहास ज्ञात है, उससे तो ऐसा ही संकेत मिलता है। ऐसे में कोई ऐसी आवाज़ अपेक्षित थी, जो गर्जना के नहीं, बल्कि अपनी बात के तर्क के, समझदारी के बल पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सके। जिसमें तर्क के साथ-साथ गहरा आत्मवि·ाास भी हो। इतना कि वह निरर्थक ¶ाोर करने वालों को बेझिझक होकर फटकार लगा सके। समय की इस आव¶यकता का जवाब फक्कड़ और मस्तमौला कबीर के रूप में मूर्त हुआ, जिन्होंने अपने-अपने मत के झंडे गाड़ने वालों को डांट भी लगाई और उनकी तर्कहीनता के लिए ललकारा भी। और कबीर ने चुनौती प्रस्तुत करने का जो मार्ग अपनाया, वह भी कम अनूठा नहीं था। उनका रास्ता वाद-विवाद या पांडित्यपूर्ण ¶ाास्त्रार्थ का रास्ता नहीं था। वह धर्म और मज़हब का आडम्बर करने वालों को सीधी-सहज लोकभाषा में मुंहफट तरीक़े से संबोधित करने में कभी नहीं चूके। और उनकी फटकार किसी एक वर्ग, एक सम्प्रदाय या एक धर्म की ओर लक्षित हो, ऐसा भी नहीं है। कबीर के लिए कहा जा सकता है कि वह कद्दद्वठ्ठथ् ग्र्द्रद्रदृद्धद्यद्वदत्द्यन्र् ग्र्ढढड्ढदड्डड्ढद्ध थे, नाराज़ करने के मामले में कोई पक्षपात नहीं बरतते थे। वह घर-बार छोड़कर संन्यास लेने वालों की स्वर्ग-कामना पर तीखे बाण छोड़ने से नहीं कतराते थे। कबीर को मज़हब को एक रस्म के तरह निभाने वाले मुल्ला-मौलवियों पर भी फ़ब्ती कसने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई : कंकर पाथर जोरी के मस्जिद ली चुनाय ता चढ़ मुल्ला बांग दे, बहरा भाया खुदाय। सीधे-सपाट ¶ाब्द, बिना किसी लाग-लपेट के। सबसे दिलचस्प बात यह कि इन प्रहारों के पीछे अपना कोई मतवाद, कोई मठ स्थापित करने की, कोई पंथ चलाने की मं¶ाा नहीं थी। सत्य को जिस रूप में पहचाना था इस फ़कीर ने, उस रूप में बयान करने की इच्छा थी। रूढ़ियों और कुरीतियों के विरुद्ध एक रोष था, जिसे स्वर देना ज़रूरी था। और इसके लिए कबीर को किसी साहित्यिक या ¶ाास्त्र सम्मत काव्य ¶िाल्प की आव¶यकता नहीं थी। जुलाहा कर्म से जुड़े उपमान उन्हें सहज ही उपलब्ध थे, जिन्हें वह योग और अध्यात्म के गूढ़तम रहस्यों के बखान में भी बिना किसे सायासता के जोड़ सकते थे : झीनी झीनी बीनी चदरिया काहे कै ताना काहे कै भरनी कौन तार से बीनी चदरिया इड़ा पिंगला ताना भरनी सुखमन तार से बीनी चदरिया आठ कंवल दल चरखा डोलै पांच तत्त्व गुन तीनी चदरिया रामानन्द जैसे गुरु की सीख, योगियों और अवधूतों की संगति और अपने परिवे¶ा को देखने-समझने की उनकी सर्वग्राही क्षमता ने उन्हें बात कहने का ऐसा स्वाभाविक और अनूठा ढब दे दिया था कि उन्होंने जो भी कहा, वह अमूल्य हो गया। कई बार "मसि कागद छुआ नहीं, कलम गही नहीं हाथ' का उद्धरण देकर कबीर को अपढ़ बता दिया जाता है। क्षण भर रुक कर सोचने पर कबीर भारत में अपने युग के सबसे अधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति के रूप मे उजागर होते हैं, जिन्होंने जीव, ब्राहृ और माया की अवधारणाओं को, द्वैत और अद्वैत के मर्म को इस हद तक आत्मसात् कर लिया था कि उन्हें ऐसी बातें समझाने के लिए भारी-भरकम ¶ाब्दों की या विस्तृत व्याख्याओं की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। पंडित बेद पुराण पढ़ैं सब, मुसलमान कुराना कहें कबीर दोउ गए नरक में, जिन हरदम राम न जाना कुछ लोगों को अचरज भी हो सकता है और इस बात से नाराज़गी भी कि कबीर वेद-पुराण में निष्णात पंडितों के साथ-साथ क़ुरान पढ़ने वालों को भी "राम' को जानने सन्दे¶ा क्यों देना चाहते हैं। यहां यह बात समझना ज़रूरी है कि कबीर उस राम की बात नहीं कर रहे हैं, जिसके नाम की उन्होंने अपने गुरु रामानंद से दीक्षा ली थी। कबीर के राम सगुण नहीं, बल्कि निर्गुण राम हैं। निर्गुण राम? ये दो ¶ाब्द, निस्संदेह विरोधाभास का चरम उदाहरण जान पड़ सकते हैं, पर थोड़ा ध्यान से सोचें, तो यहां विरोधाभास तो है, लेकिन तत्व रूप में कोई अंतर्विरोध नहीं है। सगुण उपासना भी अंततः निर्गुण तक पहुंचने का माध्यम ही तो है। कबीर निर्गुण के उपासक थे, सगुण-साकार के पीछे छिपे मर्म को, अध्यात्म के असली तत्व को उन्होंने पहचान लिया था। इस अ¶िाक्षित या अर्ध¶िाक्षित जुलाहे के सीधे-सरल ¶ाब्दों में निहित गहरे अध्यात्म को, उसके पदों और साखियों में से झांकते चिरंतन सत्य को बीसवीं ¶ाताब्दी के मनीषी कवि रवींद्र नाथ टैगोर ने पहचाना था। भारत में आध्यात्मिकता समुदायों और सम्प्रदायों की सीमाओं को कैसे पीछे छोड़ गई थी, यह स्पष्ट करने के लिए टैगोर कबीर का और साथ ही नानक और चैतन्य का उदाहरण देते थे। टैगोर व्यक्ति और ई·ार या ई·ारीय ¶ाक्ति के सम्बन्ध की चर्चा में भी अक्सर कबीर का उल्लेख करते थे। 1917 में अमरीका में दिए गए अपने भाषणों पर आधारित पुस्तक घ्ड्ढद्धद्मदृदठ्ठथ्त्द्यन्र् (व्यक्तित्व) में उन्होंने इस सम्बन्ध को व्याख्यायित करते हुए कहा - मनुष्य को "व्यक्ति' और "परम व्यक्ति' के सम्बन्ध में भी ज्ञात रहा है, रूपों और परिवर्तनों के या काल और अंतरिक्ष में विस्तार की दुनिया के माध्यम से नहीं, बल्कि चेतना के अंतरतम एकांत में, गहनता और उत्कटता के क्षेत्र में। इस धारणा की पुष्टि में उन्होंने कबीर के एक पद के स्वयं के किए हुए अनुवाद का उदाहरण दिया : तू सूरत नैन निहार वह अंड में सारा है तू हिरदै सोच विचार ये देस हमारा है सतगुरु दरस होय जब भाई वह दें तुमको प्रेम चिताई सुरत निरत के भेद बताई तब देखे अंड के पारा है। Open your eyes of love, and see Him who pervades the world! Consider it well, and know this is your own country. When you meet the true Guru, he will awaken your heart; he will tell you the secret of love, and detachment, and then you will know indeed that he transcends this universe. गहरे से गहरे आध्यात्मिक सत्य का सीधे सरल ¶ाब्दों में सामान्य जन से साझा करने में समर्थ कबीर अपने समय में बहुत लोकप्रिय थे, इसमें तो कोई संदेह नहीं है। एक बड़े पैमाने की सामाजिक क्रान्ति उस दौर में ¶ाुरू हुई, जिसके केंद्र में कबीर थे। लेकिन यह क्रान्ति परवान नहीं चढ़ सकी। बरसों पहले मुक्तिबोध ने अपने एक लेख में इस सम्बन्ध में चर्चा करते हुए चंडीदास की इन पंक्तियों का हवाला दिया था : ¶ाुनह मानुष भाई, ¶ाबार ऊपरे मानुष ¶ातो, ताहार ऊपरे नाई। मुक्तिबोध ने कहा था- इस मनुष्य-सत्य की घोषणा के क्रांतिकारी अभिप्राय कबीर में प्रकट हुए। कुरीतियों, धार्मिक अंधवि·ाासों और जातिवाद के विरुद्ध कबीर ने आवाज़ उठाई। वह फैली। निम्न जातियों में आत्मवि·ाास पैदा हुआ। उनमें आत्मगौरव का भाव हुआ। समाज की ¶ाासक सत्ता को यह कब अच्छा लगता। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का प्रारम्भिक प्रसार और विकास उच्चवं¶िायों में हुआ। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का संघर्ष निम्न वर्गों के विरुद्ध उच्चवं¶ाी संस्कार¶ाील अभिरुचि वालों का संघर्ष था। सगुण मत विजयी हुआ। क्या यह कहानी सचमुच पंद्रहवीं ¶ाताब्दी की कहानी है? तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि यह इक्कीसवीं ¶ाताब्दी के भारत का आंखों देखा हाल है। अंतर इतना भर है कि इस सदी में अभी इतिहास को अपना निष्कर्ष देने का समय नहीं मिला है। कबीर ¶ाायद कभी इतने प्रासंगिक नहीं रहे, जितने आज हैं Share Tweet गुलशन मधुर, सुनो भई साधो अविस्मरणीय कबीर ALERT     CATEGORY शिकागो की डायरी न्यूयॉर्क की डायरी चीन की डायरी सिंगापुर की डायरी बातचीत स्मरण यात्रा संस्मरण अनुवाद हाइकू ग़ज़ल सम्पादकीय मुद्दा तथ्य परम्परा कम्पैक्ट फीचर नजरिया समसामयिक संस्मरण पुस्तक अंश चिन्तन किताब अभिमत रपट वर्षा स्मृति पर्यटन प्रतिक्रिया स्वराज-स्मृति पुस्तक-अंश पुस्तक-चर्चा संकलन अपनी बात आवरण विशेष शब्द चित्र सामयिक विमर्श रम्य रचना व्याख्या कविता विचार जन्नत की हकीकत शायरी की बात मन की बात यात्रा-डायरी सिनेमा-स्मृति चर्चा डायरी कभी-कभार तकनीक कृति-स्मृति उपन्यास अंश ग्राम-स्मृति चिट्ठी-पत्री AUTHOR अ अंजली त्रिपाठी (5) अजय गर्ग (1) अजय 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सन्त मत

रूहानी मार्ग Wednesday, August 10, 2016 सन्त मत      सन्त मत का अभिप्राय है सन्तों की मति अर्थात् मत पर चलना। सन्त मत में सबसे मुख्य तीन बातें हैंः- 1.सद्गुरु, 2.सत्संग,3.सत्यनाम। सन्त मत में इन तीनों से ही सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है। जब तक इन तीनों से सम्पर्क नहीं किया जाता तब तक वास्तविक उद्देश्य अर्थात् आत्म-कल्याण नहीं हो सकता।      सर्वप्रथम मनुष्य को सद्गुरु से मिलाप करना है। उनके सामीप्य में रहना तथा उनके पवित्र वचन श्रवण करना ही सत्संग है। उनके पावन उपदेश तथा वचनों को अपने ह्मदय में धारण करना प्रधान धर्म है। तदनन्तर सद्गुरु उसे सत्यनाम अर्थात् सुरत शब्द का भेद बतलाएंगे। जिसकी साधना और अभ्यास करने से जीव के सब सांसारिक एवं मायिक बन्धन कट जाते हैं। यह सत्यनाम क्या वस्तु है? यह कोई बाह्र विद्या नहीं जिसे पढ़ने-पढ़ाने से जाना जा सके। यह आन्तरिक ब्राहृविद्या है। इसका सम्बन्ध जीव की सुरति और उसकी विचारधारा से है। इसलिये सन्तमत में इसे सुरत-शब्द-योग कहा जाता है। इसका भाव यह है कि जीव की सुरति के साथ-शब्द-ब्राहृ का मिलाप हो जाना।      इस सृष्टि का कत्र्ता परब्राहृ शब्द रुप में सम्पूर्ण ब्राहृाण्ड के अणु-अणु में ओत प्रोत है। यही शब्द-ब्राहृ ही प्रत्येक प्राणी के रोम-रोम में रमा हुआ है। और यही हर एक जीव का प्राणाधार है। इसी शब्द के ही आधार पर यह जीव सब सम्बन्धियों व मित्रों को अच्छा मालूम होता है। इसी के आधार पर ही स्थिर है और उसकी देह संसार में कार्य कर रही है। और समस्त प्राणी इसको प्यार करते हैं। यदि यह शब्द इस जीव के साथ न रहे तो इसे मृतक कहा जाता है। वे ही मित्र सम्बन्धी जो इसके साथ प्यार करते थे फिर इससे घृणा करने लगते हैं। फिर यह मनुष्य जलाने, पानी में बहाने अथवा मिट्टी में दबाने के योग्य ही होगा। यह शब्द इस मानव जीवन में इतना महत्त्वपूर्ण है।      इस शब्द-ब्राहृ का ज्ञान सन्त-सद्गुरु ही प्रदान कर सकते हैं। सन्त मत में सुरत-शब्द योग या सत्यनाम का भेद सद्गुरु से ही प्राप्त होता है। जिस प्रकार बाह्र विद्या विद्यालयों व महाविद्यालयों में प्राप्त हो सकती है। इसी भांति ब्राहृ विद्या का ज्ञान भी सन्त मत में सद्गुरु से ही प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं कि यह सब ज्ञान पाठ्य-पुस्तकों में लिखा होता है तो भी उसे समझने के लिये विद्यालय, महाविद्यालय व विश्व विद्यालयों में जाकर सतर्क होकर अध्यापकों से पाठ सुनने पड़ते हैं क्योंकि उन पुस्तकों में जो भेद छुपा होता है उसे शिक्षक ही व्यक्त करते हैं वे उसकी व्याख्या करके विद्यार्थी के मस्तिष्क में उसे बैठाते हैं जिससे विद्यार्थी उससे लाभान्वित होते हैं।      इसी प्रकार ब्राहृविद्या अर्थात् सुरति शब्दयोग का रहस्य सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रों में छुपा हुआ होता है परन्तु पढ़ने वाले लोग उस भेद को जान नहीं सकते। वे कई बार उन पुस्तकों को पढ़ते हैं किन्तु उन पर वह भेद स्पष्ट नहीं होता। वह भेद उन पर तभी स्पष्ट होगा जब वे सन्त सद्गुरु की शरण में आयेंगे। सद्गुरु उन गूढ़ रहस्र्यों को उन्हें समझाएंगे तब वे जान सकेंगे कि उन धार्मिक पुस्तकों में क्या लिखा हुआ है। और सत्पुरुष उन ग्रन्थों में क्या क्या भेद छोड़ गये हैं। उस राज को जान करके ही उन्हीं पुस्तकों को फिर से पढ़ने में उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता होगी।      वस्तुतः सन्तमत में ही ब्राहृविद्या का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। वह ज्ञान-प्राप्त भी केवल केवल सद्गुरु से होता है। जब जीव सद्गुरु की निष्काम सेवा करेगा, शब्द का अभ्यास करेगा, सद्गुरु का पवित्र सत्संग श्रवण करेगा तथा अपने विचारों को सद्गुरु की मौज के अनुसार बनायेगा तो फिर उसको सद्गुरु का वास्तविक स्वरुप दृष्टिगोचर होगा। उनके शब्द-स्वरुप में एकाग्र होने से सद्गुरु के आध्यात्मिक सत्संग का आन्तरिक उद्देश्य उसकी समझ में आयेगा। 33 गुर का सबद लगो मन मीठा। पारब्राहृ ताते मोहि डीठा।।राग गौड़ी महला 5. पृ.187) सन्तमत में जीव को अपनी विचारधारा में परिवर्तन करना होता है-यही सबसे अनिवार्य शर्त है। इसी से वह इस मार्ग में उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकता है जब तक वह जीव अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में सम्मिलित नहीं करता तब तक वह आत्मिक प्रगति नहीं कर सकता। उसको ब्राहृविद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती। सन्त मत में अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में मिला देना अर्थात एक रंग हो जाना ही सबसे बड़ा कर्म है। यही सबसे बड़ा ज्ञान, सेवा और योग है। अपने विचारों को मिटा करके सद्गुरु जी की मौज को अपनाना ही सबसे ऊँची शिक्षा है। जैसे पानी पानी में मिलकर एक रुप हो जाता है वैसे ही जीवों के विचार सद्गुरु के विचारों में मिल कर एक रुप हो जाते हैं। यही सन्त मत की अन्तिम मंज़िल है।        सेवक स्वामी एक मति, जो मति में मति मिलि जाय।                 चतुराई   रीझे   नहीं  ,   रीझे   मन   के  भाय।। सेवक और स्वामी अथवा जीव और सद्गुरु तभी एक मत हो सकते हैं जब जीव सद्गुरु की मौज के अनुसार ही आचरण करे। सद्गुरु की आज्ञानुसार तन और धन से सेवा करे। जब तन व धन से सेवा करेगा तो मन स्वयमेव सद्गुरु की ओर जायेगा। जब मन सद्गुरु के ध्यान व स्मरण में लगेगा तो उसके विचार शनैःशनैः सद्गुरु के विचारों में लीन हो जाएंगे। पुनः ऐसा समय आयेगा जब वह सद्गुरु की कृपा से एकमत हो जाएगा।      सन्त मत में सबसे विकट समस्या यही होती है कि जीव अपने विचारों का त्याग नहीं करता यह जीव चाहे स्त्री-पुत्र-धन माल आदि सब वस्तुओं का त्याग करे किन्तु जब तक अपने विचार और अपनी मनमति नहीं छोड़ता तब तक अपने ध्येय पर नहीं पहुँचता। सन्त मत के जिनते महान आचार्य हो गुज़रे हैं जैसे परमसन्त श्री कबीर साहिब जी, श्री गुरुनानकदेव जी, श्री परमहँस अद्वैत मत के महान प्रथम आचार्य श्री परमहंस दयाल जी महाराज और उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों का यही मत रहा है कि श्री गुरु-आज्ञा का पालन करना ही जीव का परम धर्म है। सर्वप्रथम कोटि का भक्त, साधु अथवा संन्यासी वह है जिसका मन अपने सद्गुरु की आज्ञा में रंगा हो। जब यह मन सोलह के सोलह आने सद्गुरु की आज्ञा में रंग जायेगा तो इस जीव के अपने विचार सद्गुरु की विचार धारा में स्वयमेव बदल जायेंगे। फिर सेवक और स्वामी एक मति हो जायेंगे।      सन्त मत के आचार्य जीव को आन्तरिक सुरत शब्द योग की युक्ति बताते हैं और मानुष देह को ही परमात्मा का वास्तविक मन्दिर बतलाते हैं। इस मानवीय काया में ही जीव को उस ज्योति स्वरुप ब्राहृ में लीन हो जाने को कहते हैं किन्तु समय समय पर विश्व में प्रकट होने वाली विभूतियों की कृपा के बिना ये जीव इस मंज़िल को प्राप्त नहीं कर सकते।      इसके अतिरिक्त सन्त मत-वर्तमान काल को सबसे अधिक महत्त्व देता है। भूतकाल एक स्वप्न है और भविष्यकाल मात्र एक विचार है। इन दोनों को छोड़कर वर्तमान समय का समादर करना चाहिये। यही समय है जिसमें जीव जो चाहे कर सकता है। बीता हुआ काल लौटा नहीं करता। यही समझना चाहिये कि जो प्रभु की मौज थी वैसा ही हुआ। सब ठीक ही हुआ इसी तरह आगे आने वाले समय की दशा है। वह भी एक विचार है हो सकता है कि वह हो या न हो। इसलिये सन्त मत के महान आचार्यों ने वर्तमान काल को विशेष गौरव प्रदान किया है उनका यह भी आदेश होता है कि यह जीव परमार्थ करे।  इस समय को सद्गुरु की आज्ञा व सेवा में ही व्यतीत करे। जिससे वह इस जीवन-काल में ही यथार्थ आनन्द व सुख को प्राप्त कर सके। अपनी सुरति  को काल व माया के चक्र से मुक्त करा ले। यह काम 34 सद्गुरु के शब्द की कमाई से और उनका ध्यान करने से सम्भव हो सकता है। यदि जीव की सुरति जीवन काल में स्वतन्त्र न हो सकी तो मरने के बाद वह अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकती। भावार्थ यह कि जीवन काल में ही सब कुछ करना है।      सन्तमत में जैसे वर्तमान काल को अत्युत्तम समझा जाता है इसी तरह समय के सन्त सद्गुरु को भी सर्वोत्कृष्ट समझा जाता है। वर्तमान के सद्गुरु की उपासना,सेवा और भक्ति ही सबसे ऊँची मानी जाती है। तत्कालीन सद्गुरु ही जीव के आमने-सामने बैठकर उसकी हर तरह से न्यूनता को पूरा कर सकते हैं।      पहले वर्णन हो चुका है कि जीव ने अपने विचारों को सद्गुरु के विचारों में लीन करना है यह तभी सम्भव है जब कि सद्गुरु सगुण रुप में सामने विराजमान हों। जीव का मन बड़ा चंचल है। हर घड़ी जीव को माया की ओर आकृष्ट करता है। सद्गुरु के चरणों में किये हुए उसके विश्वास पर चोट करता हैऔर उसे अनेक प्रकार के भ्रम व संशयों के चक्र में डाल देता है। इन सब बातों और रुकावटों से बचने के लिये जीव को वर्तमान सद्गुरु की छत्रच्छाया की अत्यन्त आवश्यकता है। समय के सद्गुरु जीव को भ्रम-संशय व सन्देहों से छुड़ाकर उसकी सुरति को अपने अनामी स्थान पर ले जायेंगे। उसे माया के चंगुल से सर्वदा के लिये विमुक्त करा देंगे।      जीव के अन्तःकरण में अनेकों विचार भरे रहते हैं। साकार सद्गुरु ही उन सब मिथ्या विचारों को काट कर अपनी एक विचार धारा जीव के हृदय में भर देते हैं। जब जीव एक विचार का अथवा एक मत का हो जाता है तो वह ईश्वर रुप हो जायेगा। क्योंकि एक विचार ही ईश्वर है और अनेक विचार जीव हैं।      आज जो समय का सम्राट अथवा न्यायाधीश होगा उसके आदेश में ही शक्ति है। इसी प्रकार प्रकृति ने इस विश्व में आध्यात्मिक परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये उस पवित्र आसन पर श्री सद्गुरुदेव जी को विराजमान किया है। जो भी सन्त सत्पुरुष इस अध्यात्म के सिंहासन पर समासीन होकर संसार में कार्य कर गये हैं उनके प्रति जीवों के ह्मदयों में अवश्य ही सम्मान होगा। किन्तु आत्मिक लाभ और मन की घड़त तत्कालीन सद्गुरु ही कर सकते हैं। वर्तमान काल के सद्गुरु की भक्ति, सेवा व आज्ञा का पालन करना ही सन्त मत है।      सन्त मत में पुरुष-स्त्री, बड़े-छोटे और जाति-पांति का भेद नहीं होता। इसकी शिक्षा सबके लिये एक जैसी है। इस भांति जब जीव सन्त मत का अनुुयायी बन जाता है तो इस भवसागर से जीवन काल में ही पार हो जाता है। जीव अपना सम्बन्ध वर्तमान सद्गुरु की पवित्र आज्ञा से, उनके पवित्र अनाहत शब्द व सुरत-शब्द-योग में लगाता है तो उसे नित्य सुख और अनुपम शान्ति मिलती है। सुरति अपने अनामी लोक जहां से यह उतरी थी पर पहुँच कर अपने मालिक सन्त सद्गुरु के स्वरुप में लीन हो जाती है। विश्व में इसलिये सन्त मत सर्वश्रेष्ठ माना गया है। Sahaj at 4:37 PM Share No comments: Post a Comment ‹ › Home View web version About Me Sahaj View my complete profile Powered by Blogger.

सुरत शब्द योग से भक्त करेंगे ध्यान

सुरत शब्द योग से भक्त करेंगे ध्यान Thu Mar 09 01:01:57 IST 2017 जागरण संवाददाता, कानपुर : सावन रूहानी मिशन एवं मानव एकता सम्मेलन के अध्यक्ष संत राजिन्दर सिंह 14 मार्च को कानपुर आएंगे। रेलवे ग्राउंड निराला नगर में वह दो दिवसीय सत्संग करेंगे और भक्तों को अध्यात्मिक दीक्षा प्रदान करेंगे। यह जानकारी बुधवार को प्रेसक्लब में संस्था के युद्धवीर सिंह चौहान और सौरव नरूला ने दी। उन्होंने बताया कि संत राजिन्दर सिंह महाराज ध्यान-अभ्यास की सरल विधि सिखाते हैं। जिसका अभ्यास स्त्री हो या पुरुष, बीमार हो या स्वस्थ प्रत्येक इंसान कर सकता है। इस विधि को सुरत शब्द योग तथा आंतरिक व श्रुति का अभ्यास भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि सत्संग 14 और 15 मार्च को रेलवे ग्राउंड निराला नगर में शाम सात बजे से प्रारंभ होगा। समापन पर भक्तों को अध्यात्मिक दीक्षा प्रदान की जाएगी। उन्होंने बताया कि संत राजिन्दर सिंह महाराज 25 वर्षो से संपूर्ण विश्व में ध्यानाभ्यास द्वारा प्रेम, एकता व शांति का संदेश प्रसारित कर रहे हैं। उन्हें विभिन्न देशों द्वारा शांति-पुरस्कारों व सम्मान के साथ पांच डॉक्टरेट उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है।

बृह्माण्ड के देशों का संक्षिप्त परिचय और श्री गुरुतत्व

सोमवार, जनवरी 02, 2012 बृह्माण्ड के देशों का संक्षिप्त परिचय और श्री गुरुतत्व बृह्माण्ड के देशों का संक्षिप्त परिचय - सहसदल कमल । बंकनाल । त्रिकुटी । सुन्न 0 यानी 10 दशम द्वार । महासुन्न 0 । भंवर गुफ़ा । सत्य लोक । अनामी पद ( गुप्त ) अलख लोक । अगम लोक । अकह लोक । कृम से ये मण्डल आज्ञा चक्र अर्थात 6 छठें चक्र के ऊपर के सत्यराज्य के लोक हैं । इस सत्यराज के 2 विभाग हैं - 1 बृह्माण्ड । और 2 निर्मल चैतन्य देश । बृह्माण्ड के अन्तर्गत - सहसदल कमल । बंकनाल । त्रिकुटी । और सुन्न 0 या 10 दशम द्वार मण्डल आते हैं । इन लोकों में योगमाया या विधा माया का प्रभुत्व रहता है । सुन्न 0 या 10 दशम द्वार के बाद भंवर गुफ़ा से अकह लोक तक के लोक निर्मल चैतन्य के देश अथवा दयाल देश कहलाते हैं । इस स्थान को ही सुरत का निज धाम कहते हैं । सदगुरू देव की उपासना, उनकी अनन्य भक्ति को छोडकर यहां पहुंचने का दूसरा कोई उपाय या साधना नहीं है । सहसदल कमल - सहसदल कमल को सन्तजन त्रिलोकी नाथ या निरंजन का देश कहते हैं । यहां तक पहुंचे हुए साधक साधना की दृष्टि से ऊंचाई पर पहुंचे हुए साधक होते हैं । इनका सदगुरू में अगाध प्रेम होता है । और जिनको श्री सदगुरू के चरणों की प्यास बराबर बनी रहती है । उनको श्री सदगुरू देव महाराज ऊपर के मण्डलों में पहुंचा देते हैं । श्री सदगुरू महाराज के जो शिष्य़ हैं । वे श्री सदगुरू के नाम भजन और ध्यान के सहारे यहां पहुंचते हैं । श्री सदगुरू भगवान को अपने संग साथ रखने वाले शिष्य को वे कृपालु माया के प्रलोभनों में नहीं फ़ंसने देते हैं । त्रिकुटी - श्री सदगुरू महाराज ने अपने शिष्यों को जो परानाम का उपदेश दिया है । वह बहुत बडी अमूल्य निधि है । उस अमूल्य निधि का सदा सदा भजन । सुमिरन । ध्यान हर स्थिति में करते रहना चाहिये । ऐसे शिष्य को सदगुरू देव बंकनाल नामक सूक्ष्म मार्ग में प्रवेश दिलाकर इसके ऊपर के त्रिकुटी नामक देश में पहुंचा देते हैं । इस त्रिकुटी नामक देश का वर्णन करते हुए सन्त दरिया साहब कहते हैं  - त्रिकुटी माहीं सुख घना । नाहीं दुख का लेस । जन दरिया सुख दुख नहीं । वह कोई अनुभवै देश । सन्त महापुरूषों ने अपने वचनों में कहा है कि - त्रिकुटी नामक यह मण्डल बृह्म का देश है । जैसे सहसदल कमल में अमृत बरसता रहता है । ठीक उसी प्रकार त्रिकुटी में भी अमृत बरसता रहता है । यहां पहुंचे हुये साधक की त्रिकुटी का अमृत पान करने व उसमें स्नान करने से आशा व तृष्णा की प्यास शान्त हो जाती है । यह त्रिकुटी नामक महल सम्पूर्ण विधाओं का भण्डार है । मन । बुद्धि । चित्त और अहंकार की गति त्रिकुटी पहुंचने तक ही रहती है । इसके आगे त्रिकुटी महल है । जहां श्री सदगुरू पूर्ण बृह्म का निवास होता है । जब साधक श्री सदगुरू की दया से बृह्म सरोवर में जाकर स्नान पान करने लग जाता है । तो वह शरीर रहते हुए भी मन, वाणी और शरीर से परे हो जाता है । ये तीनों उसे प्रभावित नहीं कर पाते हैं । जब त्रिकुटी की सन्धि में स्थिरता पूर्वक श्री सदगुरू के नाम का भजन । सुमिरन । ध्यान होने लगता है । तो प्राण इङा पिंगला नाडियों को छोडकर अवश्य ही सुषुम्रा नाङी में प्रवाहित होने लगता है । और तब अपने श्री सदगुरू देव के प्रति श्रद्धा और निष्ठा की अटूट धारा बहने लगती है । श्री सदगुरू देव महाराज ने इस प्रकार त्रिकुटी नामक मण्डल का पूर्ण रहस्य बतलाया । जिसे केवल समय के सन्त महापुरूषों की चरण शरण में जाने से ही जाना जा सकता है । केवल वाणी विलास या पुस्तकीय ज्ञान से भक्ति की आध्यात्मिक मंजिलों ( आन्तरिक मंजिलों ) को पार करना असम्भव है । इसी आन्तरिक मार्ग को पार करने के लिये परम सन्त कबीर साहब जी उपदेश देते है  - त्रिकुटी में गुरूदेव का । करै जो गुरू मुख ध्यान । यम किंकर का भय मिटे । पावे पद निर्वान । सुन्न 0 या 10 दशम द्वार - जब शिष्य की सुरत श्री सदगुरू देव महाराज के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान के दृढ अभ्यास से इस त्रिकुटी नामक मण्डल में पहुंचती है । तब उसको सत शिष्य का दर्जा प्राप्त हो जाता है । फ़िर वह 10 दशम द्वार में प्रवेश करना चाहता है । इस 10 दशम द्वार में जिस गुरू भक्त की सुरत सदगुरू की कृपा से पहुंच जाती है । वही गुरू भक्त सच्चे अर्थों में सत शिष्य कहलाता है । साधु कहलाता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम के भजन । सुमिरन और उनकी सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान की प्रगाढता के भाव दशा में साधक की सुरत त्रिकुटी मण्डल से चलकर जब 10 दशम द्वार में प्रवेश कर श्री सदगुरू देव जी महाराज का श्रद्धा । प्रेम । प्यार के साथ इतना स्पष्ट दर्शन करती है । जितना स्पष्ट स्वच्छ दर्पण में अपना चेहरा दिखलाई देता है । तब साधक की सुरत शून्य मण्डल 0 या 10 दशम द्वार में प्रवेश कर श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा प्राप्त कर अपने को धन्य धन्य मानने लग जाती है । इस प्रकार साधक की सुरत को 10 दशम द्वार में पहुंचने से उसमें शुद्ध परमार्थ का उदय हो जाता है । अपने श्री सदगुरू देव महाराज के स्वरूप में स्फ़टिक के समान अत्यन्त उज्ज्वल सफ़ेद प्रकाश विधमान रहता है । सन्त महापुरूषों का कहना है कि शून्य मण्डल 0 या 10 दशम द्वार में अक्षय पुरूष के आसन के नीचे अमृत का 1 कुण्ड है । जिसको मान सरोवर कहते है । उसमें साधक के स्नान । पान । ध्यान करने से उसकी सुरत विशेष निर्मल हो जाती है । इसीलिये यहां पहुंची हुई सुरत की हंस गति हो जाती है । महासुन्न 0 - इसके बाद श्री सदगुरू देव जी महाराज अपने ही प्रकाश के द्वारा सुरत को महासुन्न 0 के घोर अन्धकार के मैदान से पार करके ऊपर के मण्डलों में ले जाते हैं । साधक जब श्री सदगुरू देव महाराज का साथ हर वक्त पकडे रहता है । तभी घोर अन्धकार युक्त इस विषम घाटी को पार कर पाता है । अर्थात श्री सदगुरू देव महाराज की चरण धूलि में स्नान करते हुए साधक घोर अन्धकारयुक्त महासुन्न 0 की विषम घाटी को पार करने में समर्थ हो जाता है । जिन आत्माओं को श्री सदगुरू देव महाराज भजन । सुमिरन । ध्यान का अभ्यास करवा करवाकर अपने साथ आगे ले जाते हैं । उन आत्माओं से महा शून्य 0 में फ़ंसी हुई आत्मायें प्रार्थना करती है कि अपने श्री सदगुरू देव महाराज के सम्मुख सिफ़ारिश करो कि हमें भी ऊपर ले चलें । यदि उन सन्तों की मौज हो जाती है । तो वे महा शून्य 0 की इन आत्माओं को अपने साथ आगे ले जाते हैं । भंवर गुफ़ा - पूरे गुरू की कृपा से जब साधक महाशून्य 0 से आगे की यात्रा करता है । तो सत्यराज्य के भंवर गुफ़ा नामक स्थान में पहुंचता है । जैसे सहसदल कमल नामक मण्डल बृह्माण्ड देश का पहला लोक है । उसी तरह शून्य 0 या 10 दशम द्वार निर्मल चैतन्य देश अथवा दयाल देश का द्वार है । और भंवर गुफ़ा नामक लोक श्री सदगुरू देव महाराज के दयाल देश नामक निज धाम का पहला लोक है । महा शून्य 0 से ऊपर की ओर सूरत या चित शक्ति की 1 गुफ़ा है । जिसे भंवर गुफ़ा कहते हैं । यहां पहुंची हुई निर्मल चैतन्य सुरतें निरन्तर भिन्न भिन्न प्रकार के उत्सव मनाती रहती है । यहां की सुरते हंस कहलाती हैं । अपने श्री सदगुरू रूपी क्षीर सागर में सदा मुरली की मधुर धुन बजती रहती है । इसी मुरली की गूंज के मध्य " सोहं " की झंकार होती रहती है । यह ऐसा ही है । जैसे बूंद समुद्र को देखकर कहे कि मैं तुम्हारा ही अंश हूं । मालिक महासागर है । और जीव बूंद है । इसी तरह आत्मा सत पुरूष को देखकर कहती है कि मै श्री सदगुरू देव जी महाराज का 1 अंश हूं । सतलोक - भंवर गुफ़ा के बाद माथे में ऊपर की ओर निर्मल चैतन्य देश का सत लोक नामक मण्डल है । अपने श्री सदगुरू देव महाराज जी के श्री चरणों में निरन्तर रमे हुए दास को श्री सदगुरू देव महाराज भंवर गुफ़ा नामक मण्डल से सत लोक नामक लोक में ले जाते हैं । इस देश के मालिक का नाम सत पुरूष है । सतलोक वह स्थान है । जहां से सम्पूर्ण रचना का प्रकाश होता है । साधक सतलोक में पहुंचकर श्री सदगुरू देव महाराज में लीन रहता है । इस तरह के बूंद यहां पहुंचकर समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है । सन्त कहते हैं कि सतलोक सर्वश्रेष्ट सुन्दरता का लोक है । यहां सभी तरफ़ उच्चकोटि की सुगन्ध फ़ैली हुई है । जो साधक अपने श्री सदगुरू देव के श्री चरणों की कृपा से सतलोक में पहुंचा है । वह 16 सूर्यों के प्रकाश जैसा तेज पुंज और उज्जवल हो जाता है । सतलोक में पहुंचकर साधक काल की सीमा से बाहर हो जाता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज का भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । ध्यान करने वाले अभ्यासी सतलोक पहुंचते हैं । सतलोक पहुंचने पर ही जीव को मुक्ति लाभ होता है । जब सत लोक राह चढि जाई । तब यह जीव मुक्ति को पाई । परन्तु धन्य है । श्री सदगुरू देव जी महाराज का यह कृपालु स्वभाव । जिससे प्रेरित होकर वे उस जीव को अपने पास न रखकर उसे निर्मल चैतन्य देश के सतलोक के ऊपर के मण्डलों पर भेज देते हैं । सतलोक तक पहुंचने में श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा के साथ साथ शिष्य के स्वयं के अभ्यास की भी अपेक्षा रहती है । परन्तु सतलोक तक पहुंच जाने के बाद शिष्य के प्रयास की दौड धूप समाप्त हो जाती है । यहां से ऊपर के मण्डलों में एकमात्र श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा ही अपने शिष्य को अपने प्रताप से आगे भेजती है । अनामी लोक - सतलोक के बाद और अलख लोक के बीच में अनामी पद नामक निर्मल चैतन्य देश है । इस स्थान की निर्मल सुरत को अनामी सम्भवत: इसलिये कहा जाता है कि सत्य लोक में अलख पुरूष सत्य नाम के रूप में  प्रकाशित हो जाता है । अनामी पद सत्य लोक के स्वामी सत्य नाम का पूर्ण रूप है । जिसे सन्तों ने गुप्त भेद भी कहा है । अलख लोक - श्री सदगुरू देव जी महाराज का विज्ञानमय स्वरूप शिष्य की आत्मा को ऊपर के अलख । अगम और अकह लोकों में पहुंचा देता है । यहां के मालिक का नाम अलख पुरूष है । अलख पुरूष के एक एक रोम में अनेकों सूर्य का प्रकाश विराजमान रहता है । अलख लोक के ऊपर अगम लोक नामक महाचैतन्य का लोक है । इसकी महिमा अधिक से अधिक है । इस लोक के मालिक का नाम अगम पुरूष है । अगम पुरूष के एक एक रोम में अनेकों सूर्य का प्रकाश है । महापुरूषों ने बताया है कि यह देश परम सन्तों का देश है । अकह लोक - इस अगम लोक के ऊपर जो अकह लोक है । उसका वर्णन करने में सन्त भी मौन हो गये । क्योंकि यहां का प्रकाश और यहां की निर्मलता बेअन्त है । इसका वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता है । जैसे गूंगे आदमी को मिठाई खिला दी जाय । और वह उस मिठाई के स्वाद का वर्णन न कर सके । उसी प्रकार इस लोक का वर्णन नहीं किय जा सकता है । क्योंकि यह लोक अवर्णनीय है । इसीलिये इसे अकह लोक कहते है । गुरू की कृपा से जो यहां पहुंचे हैं । वही इसका अनुभव कर पाते हैं । तभी तो सन्त भीखा साहब कहते हैं कि इसकी गति अगम्य है - भीखा बात अगम्य की । कहन सुनन में नाहिं । जो जाने सो कहे ना । कहे सो जाने नाहिं । कहने का तात्पर्य यह है कि जो साधक अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज के बताये हुए नाम का भजन । सुमिरन तथा उनकी सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान पूर्ण श्रद्धा के साथ करता जाता है । वह सदा अपनी एक के बाद दूसरी आध्यात्मिक मंजिल पर चढता चला जाता है । पल पल सुमिरन जो करे । हिरदय श्रद्धा धार । आधि व्याधि नाशे सकल । चढ जावै धुर धाम । साधक यदि नियम पूर्वक प्रतिदिन भजन । सुमिरन । ध्यान । यानी सुरत शब्द योग का अभ्यास करते हैं । तो उनको आन्तरिक आनन्द का अनुभव होने लगता है । और उनका चित्त प्रसन्न रहने लग जाता है । यह श्री सदगुरू देव जी महाराज की प्रत्यक्ष दया और उनकी कृपा है । जो शिष्य को गुरू की भक्ति की दिशा में ले जाती है । गुरू की भक्ति की दिशा में ले जाने का तात्पर्य यह है कि साधक की चेतना के ज्ञानात्मक और क्रियात्मक और भावात्मक पक्ष श्री सदगुरू देव जी महाराज पर श्रद्धा और विश्वास के रंग में ऐसे रंग जाते हैं कि श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा से शिष्य का ज्ञान और उसके सम्पूर्ण कर्म गुरू भक्ति के रस से सराबोर हो जाते हैं । इस भक्ति की साधना में परानाम का सुमिरन । और ध्यान अर्थात गुरू स्वरूप का अपने अन्तर्चक्षुओं 3rd eye से दर्शन करना । और उनकी मानसिक सेवा । पूजा करने का प्रधान स्थान है । इसमें अपने श्रद्धा भाव द्वारा ही श्री सदगुरू देव जी महाराज के भाव स्वरूप का भजन ध्यान किया जाता है । इस प्रकार की उपासना से गुरू भक्ति के साधक अपने श्री सदगुरू की कृपा से माथे में भाव राज्य के द्वार को खोलकर अन्दर प्रवेश कर जाते हैं । और श्री सदगुरू देव जी महाराज के असीम दया से निकली हुई चेतना की निर्मल किरणों की सहायता से उनकी महिमा का रसास्वादन करते हुए उनके परम धाम की ओर बढने का सतत प्रयास करते हैं । प्रभु को प्राप्त करने के जो अभिलाषी भक्ति की साधना के द्वारा मन को इष्ट के साथ जोड लेते हैं । वही मालिक को प्राप्त कर सकते हैं । सदा सदा ही मालिक के भजन । भक्ति । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में रत रहने वाले प्रभु को प्राप्त करने के अभिलाषी शिष्य में स्वभावत: गुरू के स्वरूप उभर आते हैं । सदगुरू की प्राप्ति को ईश्वर का साक्षात अनुग्रह समझना चाहिये । गुरू का दर्शन । उनमें पूर्ण भक्ति भाव । उनकी प्रसन्नता प्राप्ति । और परिणाम स्वरूप अन्त: दर्शन की व्याकुलता । ये सभी ईश्वर के सार्थक अनुग्रह बताये गये हैं । ईश्वर के अनुग्रह कारी स्वरूप को गुरू तत्त्व कहते हैं । ************** यह लेख और - गुरु मोक्ष का द्वार हैं । श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजा गया है । आपका बहुत बहुत आभार ।  RAJEEV BABA पर सोमवार, जनवरी 02, 2012 साझा करें कोई टिप्पणी नहीं: एक टिप्पणी भेजें टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है. ‹ › मुख्यपृष्ठ वेब वर्शन देखें WELCOME RAJEEV BABA AGRA, U.P, India ये मेरे परमपूज्य गुरुदेव सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज परमहंस की तस्वीर है उनका सम्पर्क नम्बर 09639892934 है और मेरा सम्पर्क नम्बर 0 94564 32709 है इन नम्बर पर आप ब्लाग लेखों से जुडी किसी भी जिज्ञासा या आत्मज्ञान सम्बन्धित किसी भी प्रश्न का उत्तर पूछ सकते हैं । मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें Blogger द्वारा संचालित.

सुरत शब्द

pankaj bahl Saturday, 15 June 2013 सुरत शब्द------5 शब्द का खुलना व शब्द अभ्यास एक आतमिक प्रक्रिया है। जो कि व्यवहारिक धरातल पर होती है , अतः इसे किसी आध्यात्मिक सिद्धान्त के रूप में नहीं समझना चाहिये। संतत राधास्वामी में , आत्मा का ठहराव,देह में,दौनों भुकटियों के मध्य , कुछ भीतर की ओर बताया गया है। जाग्रत अवस्था में आत्मा की धार इसी स्थान से उतर कर आंखों में आती और फिर पूरी देह में व्याप्त हो जाती है। तो दौनों भुकटियों के मध्य जो बिन्दु है,वही शब्द धार का देह में ठहराव और आंखों में जो प्रकट होता है, वह भाव है। फिर देह की जो क्रियाशीलता है वह भावनाओं पर आधारित होती है और भावनाऎ सकारत्मक व नकारात्मक दौनो प्रकार की होती हैं , जो कि जीव के वर्ताव व व्यवहार में स्पष्ट होती रहती हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि देह व मन की क्रियाशीलता का कारण , शब्द धार की उपस्थिति ही है। इसी लिये संतमत में ध्यान को मध्य बिन्दु पर एकाग्र करने का विधान है। मध्य बिन्दु या तिल , मस्तिष्क का एक भाग या अंग है और शरीर विज्ञान की भाषा में इसे ओलफैक्टरी बल्ब कहा जाता है , जैसा कि चित्र में स्पष्ट है। ------------ क्रमशः  तिल के दूसरे छोर पर स्थित भाग को अमयगदाला Amygdala कहा कहा गया है । जो कि मनुष्य की सकारात्मक , नकारात्मक व भावनात्मक सोच का केन्द्र होता है। सामान्य अवस्था में Amygdala का स्तर सामान्य होता है और जीव का व्यवहार भी , पर उत्तेजना की स्थिति में अमयगदाला का स्तर भी बढने लगता है , और जैसे-जैसे यह स्तर बढता जाता है , उत्तेजना के साथ-साथ जीव के वर्ताव व व्यवहार में नकारत्मक्ता या विकार प्रकट होने लगते है। और अत्यधिक उत्तेजना की स्थिति में मनुष्य का चेतन मस्तिष्क कार्य करना बन्द कर देता है और अवचेतन मस्तिष्क में समाहित समस्त नकारात्मक्ता व विकार( काम , क्रोध , लोभ , मोह व अहंकार ) जीव के व्यवहार में प्रकट होने लगते हैं। एक मनुष्य और अन्य सभी जीवधारियों में यही मूल भेद है। अन्य सभी जीवों में केवल अवचेतन मस्तिष्क ही होता है। इसीलिये वे मुख्यतः अपने अनुभवों के आधार पर मात्र प्रतिक्रया ही करते है और किसी भी विषय पर मनन् व चिंतन नहीं कर सकते। अतः उत्तेजना की उच्च स्थिति में मनष्य भी पशुवत व्यवहार करनें लगता है। तो किस प्रकार मनुष्य उत्तेजना की स्थिति पर नियंत्रण कर सकता है .......इसका भेद शब्द-अभ्यास की रीत में छिपा है । जिसे एक प्रेमी सतसंगी और अभ्यासी व्यक्ति ही जान सकता है। सबको राधास्वामी जी राधास्वामी हैरिटेज ( संतमत विश्वविधालय की स्थापना के प्रति समर्पित ) pankaj at 10:04 Share No comments: Post a Comment ‹ › Home View web version About Me pankaj View my complete profile Powered by Blogger.

राधास्वामी मत की गोपनीय विधि

HOME INDIA UTTAR PRADESH AGRA राधास्वामी मत की गोपनीय विधि सुरत शब्द योग के बारे में जानिए  BHANU PRATAP Publish: Jun, 10 2016 12:36:00 (IST) AGRA, UTTAR PRADESH, INDIA राधास्वामी मत के अधिष्ठाता और आगरा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, इतिहासवेत्ता, समाज सुधारक प्रो. अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज) ने सुरत शब्द योग के बारे में पत्रिका को जानकारी दी। आगरा। राधास्वामी मत के अधिष्ठाता और आगरा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, इतिहासवेत्ता, समाज सुधारक प्रो. अगम प्रसाद माथुर (दादाजी महाराज) ने सुरत शब्द योग के बारे में पत्रिका को जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह गोपनीय है। राधास्वामी मतावलंबियों के लिए सुरत शब्द योग को राधास्वामी मत के लोग जानते हैं। राधास्वामी मत में जो शामिल हैं, उन्हें यह विधि बताई जाती है। उन्हीं लोगों के लिए है जो इस मत के मौलिक सिद्धांतों को मानते हैं। यह अभ्यास की एक विधि है। ध्यान भी है। उसके अलावा भी कुछ और है, ध्यान तो पहले ही है। सनातम धर्म के लोग क्या करते  हैं, मैं उस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।  मुक्त प्राप्ति की विधि सारी रचना सुरत पर आधारित है। उससे आत्मा का मिलन सही तौर पर नहीं हुआ, तो तब तक मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती है। उसी के लिए यह एक विधि है, उसे बताई जाती है, अभ्यास किया जाता है। हम उसे अभ्यासी कहते हैं। यह गोपनीय है, इसलिए इसकी व्याख्या सार्वजनिक तौर पर  नहीं की जा सकती है। हां, प्रेमभाव और दीनता का आना और सामान्य रूप से हर एक के साथ हमदर्दी का बरताव, ये तो समय की पुकार भी है और सुरत शब्द योग का अभ्यासी उस पर खरा उतरता है। देखें वीडियो विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मॅट्रिमोनी में निःशुल्क रजिस्टर करें ! Web Title "Surat shabd yoga,radhasoami and dadaji " SUBSCRIBE TO OUR NEWSLETTER Never miss any news Email Address आगे पढे़ं केंद्रीय राज्यमंत्री के समर्थकों ने NSUI के कार्यकर्ताओं को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा   LATEST NEWS Home About Us Advertise Careers Newsroom Archive Privacy Policy Sitemap © 2017 Patrika Group

सुरत शब्द योग (अभ्यास)

प्र०1 सुरत शब्द योग (अभ्यास) क्या होता है है ???

उत्तर- सुरत शब्द का अर्थ है शब्द पर ध्यान । कि मे क्या जाप कर रहा हूँ । यह सुरत शब्द है । और सुरत शब्द योग होता है कि लगातार उस नाम जो गुरू ने दिया है उस पर ध्यान रहे कि हम क्या जाप कर रहे है ।

कबीर साहेब कहते है -
माला तो कर मे फिरे , जीव फिर मुख माहिं
मनवा तो चौदस फिरे , यह तो सुमरन नाहि

सतगुरू रामपाल जी बताया है कि - जो नाम आप जाप कर रहे हो उस पर ध्यान रहे और इस चीज का अभ्यास हो जाना ही सुरत शब्द योग कहते है ।

जब आप सुमरन करें तो
1) मन
2) पवन
3) सुरति
4) निरति

यह चारों पदारथ जहाँ एक जगह पर आजाएं इसे ही सुरत शब्द योग कहा जाता है ।
आजकल कुछ नकली पंथ राधास्वामी ने इसी सुरत शब्द का पता नही क्या बना रखा था । 2 घंटे सुबह 2 घंटे शाम को । यह सब पागलों की साधना है ।

अब सतगुरू रामपाल जा आएं हुए है देखो कब दया होगी कब समझें गें मालिक के बच्चे उनको ।दोइ कमल की अणि अग्र पर रूप शब्द का देखा। सुरत शब्द में लीन भइ तब दिया कर्म पर मेखा॥     महात्माजी ये सब बातों से सिद्ध नहीं हो सकता परमतत्त्व को जो महापुरुष प्राप्त हुए है वहीं ये कह सकते है क्योंकि ये दोइ कमल क्या है और अणि अग्र क्या है शब्द का रूप क्या है वो जिसने देखा है वहीं जानता है वहीं कर्म पर मेखा मार सकते है।