Thursday, 26 October 2017

निरंजन तेरे घट में, माला फ़िरे दिन रात 

▼ 29 जुलाई 2016 सिद्धि मुद्रायें और असिद्ध परमात्मा अवधू गगन से खोज न्यारा ?  कबीर कहते हैं - परमात्मा पाँचवें तत्व या पाँचों तत्व से भी परे हैं  अर्थात शरीर से बाहर है । ये सिर्फ़ समाधि द्वारा स्थिर हुयी विदेह अवस्था में संभव है अथवा निजत्व में पूर्ण और निश्चयात्मक असंशय भाव से थिर होकर संभव है । संतों शब्दई शब्द बखाना । (सभी शब्द, नाम, धुनों आदि का वर्णन परमात्मा की प्राप्ति के लिये कर रहे हैं) शब्द फांस फँसा सब कोई, शब्द नहीं पहचाना ? (और इन्हीं नकली शब्दजाल में फ़ंस कर रह गये । असली शब्द या ‘वस्तु’ की तरफ़ किसी का ध्यान नही है) प्रथमहिं ब्रह्म स्वं इच्छा ते, पाँचै शब्द उचारा ।  (आदि सृष्टि के समय ब्रह्म ने इच्छा करते हुये 5 शब्दों को उत्पन्न किया - सोहं निरंजन रंरकार शक्ति और ॐकार) सोहं निरंजन रंरकार, शक्ति और ॐकारा ।  पाँचों तत्व प्रकृति, तीनों गुण उपजाया ।  (फ़िर 5 तत्व और हरेक तत्व की 5-5 = 25 प्रकृति और 3 गुणों (सत, रज, तम) को उत्पन्न किया) लोक द्वीप चारों खान,  चौरासी लख बनाया ।  (फ़िर लोक, दीप, चार खाने (अंडज, जरायुज, स्वेदज, वारिज) और 84 लाख जीव जन्तुओं को बनाया । शब्दइ काल कलंदर कहिये, शब्दइ भर्म भुलाया ।  (शब्द को ही काल, खिलाङी कहिये और शब्द से ही समस्त भ्रम उत्पन्न हुआ) पाँच शब्द की आशा में, सर्वस मूल गंवाया ?  (इन पाँच शब्दों के चक्कर में फ़ंसकर जीव अपना मूल परमात्मा को भूल गया) शब्दइ ब्रह्म प्रकाश मेंट के, बैठे मूंदे द्वारा ।  (यही शब्द ब्रह्म आत्मप्रकाश छुपाकर मुक्ति या परमात्म द्वार को बन्द कर स्थित हो गये) शब्दइ निरगुण शब्दइ सरगुण, शब्दइ वेद पुकारा ।  शुद्ध ब्रह्म काया के भीतर, बैठ करे स्थाना ? ज्ञानी योगी पंडित औ, सिद्ध शब्द में उरझाना ।  पाँचइ शब्द पाँच हैं मुद्रा, काया बीच ठिकाना ?  मनुष्य शरीर के बीच (सभी आँखों से ऊपर) हंस के 5 शब्द कृमशः निरंजन, ॐकार, सोहं, रंरकार, शक्ति और 5 मुद्रायें कृमशः चांचरी, भूचरी, अगोचरी, खेचरी, उनमुनी हैं । जो जिहसक आराधन करता, सो तिहि करत बखाना ।  शब्द निरंजन चांचरी मुद्रा, है नैनन के माँही ?   (चाचरी मुद्रा, दोनों आँखें बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर सिद्ध की जाती है) ताको जाने गोरख योगी, महा तेज तप माँही ।  शब्द ॐकार भूचरी मुद्रा, त्रिकुटी है स्थाना ?  (भूचरी मुद्रा, सोहं - हंसो अजपा जप को प्राण (स्वांस) के मध्य ध्यान में रखकर सिद्ध की जाती है) व्यास देव ताहि पहिचाना, चांद सूर्य तिहि जाना ।  सोहं शब्द अगोचरी मुद्रा, भंवर गुफा स्थाना ?  (अगोचरी मुद्रा, दोनों कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनकर सिद्ध की जाती है) शुकदेव मुनी ताहि पहिचाना, सुन अनहद को काना ।  शब्द रंरकार खेचरी मुद्रा, दसवें द्वार ठिकाना ?  (खेचरी मुद्रा में जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र (तालु) और काग तक बारबार छुआकर पहुँचाकर सिद्ध की जाती है । यह मुद्रा हनुमान जी को सिद्ध थी । जिससे उन्हें उङने, छोटा बङा शरीर आदि बना लेने की कई सिद्धियां प्राप्त थीं) ब्रह्मा विष्णु महेश आदि लो, रंरकार पहिचाना । शक्ति शब्द ध्यान उनमुनी मुद्रा, बसे आकाश सनेही ?  (उनमनी मुद्रा में दृष्टि को भौंहों के मध्य टिकाकर मुद्रा सिद्ध की जाती है) झिलमिल झिलमिल जोत दिखावे, जाने जनक विदेही ।  पाँच शब्द पाँच हैं मुद्रा, सो निश्चय कर जाना ।  आगे पुरुष पुरान निःअक्षर, तिनकी खबर न जाना ?  नौ नाथ चौरासी सिद्धि लो,  पाँच शब्द में अटके । मुद्रा साध रहे घट भीतर, फिर औंधे मुख लटके ? पाँच शब्द पाँच है मुद्रा, लोक द्वीप यम जाला ।  कहैं कबीर अक्षर के आगे ? निःअक्षर का उजियाला । सभी मुद्रायें 10 हैं । जिनमें 5 हंसों की और 5 विशेष परमहंसों की मुद्राएं हैं । परमात्मा ने जैसे ब्रह्माण्ड की रचना की ठीक उसी आकार में  मनुष्य शरीर की रचना की । इच्छानि सृष्टि - संकल्प द्वारा सृष्टि करना । सासिद्धक सृष्टि - इच्छानुसार शरीर बना लेना । मुद्राएं - योग स्थितियों के साक्षात्कार और प्राप्ति के लिये की गयी क्रिया अवस्था को मुद्रा कहते हैं । यह 10 प्रकार की हैं । निम्न 5 हंसों की मुद्रायें हैं । 1 चाचरी - आँख बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर देखना । 2 भूचरी - परमात्मा का नाम (हँसो) अजपा जप को प्राण के मध्य ध्यान में रखकर मनन करना । 3 अगोचरी - कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनना । 4 खेचरी - जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचाकर स्थिर करना । 5 उनमनी - द्रष्टि को भौंहों के मध्य टिकाना । ये 5 विशेष और परमहंसों की मुद्राएं हैं उनका साक्षात्कार प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है । 1 साम्भवी - जीवों में संकल्प से प्रवेश कर उनके अन्तःकरण का अनुभव करना 2 सनमुखी - संकल्प से ही सभी कार्य होने लगे । 3 सर्वसाक्षी - स्वयं को, तथा परमात्मा को सबमें देखना । 4 पूर्णबोधिनी - जिसका विचार (या इच्छा) करता है । उसकी पूर्ति तथा बोध पल भर में ही हो जाता है । एक ही जगह स्थित सम्पूर्ण जगत की बात जानना । 5 उनमीलनी - अनहोने कार्य करने की सिद्धि । at 9:40 pm साझा करें 26 जुलाई 2016 बच्चे न पढ़ें न सही..पर बाल्यावस्था में ऐसी ही एक कहानी पढ़ी थी । जिसमें एक युवा चोर को न्यायालय में न्यायाधीश द्वारा सजा सुनाई जा रही थी । वाद निर्णय के दौरान चोर की माँ भी उपस्थिति थी । चोर को सजा होने के बाद न्यायाधीश ने उससे पूछा - तुम कुछ कहना चाहते हो ? चोर ने कहा - हाँ, वह बात मैं अपनी माँ के कान में कहना चाहता हूँ । चोर अपनी माँ के पास गया । और उसका कान काट कर बोला - यदि बचपन में ही तू मुझे चोरी करने पर रोकती । प्रताङित करती । तो आज यह दिन नहीं आता ।  फ़िर कुछ ऐसे ही मिले जुले भावों की और भी कहानियां पढ़ीं । जिनमें किसी छोटे गांव, छोटे कस्बे जैसे स्थान पर किसी छोटे से ही स्कूल में अचानक किसी उच्चाधिकारी का वाहन रुकता है । उच्चाधिकारी वाहन से उतरकर प्राथमिक विद्यालय के उन गुरु को आदर से चरण स्पर्श करता है । तो सहमे से और झेंपे से वह गुरु चौंक कर उस अधिकारी से उसका परिचय पूछते हैं । और वह कहता है - गुरुजी, मैं आपका वही नालायक शिष्य चिन्टू पिन्टू ( आदि ) हूँ । जिसे आपने झूठ बोलने, चोरी करने, पाठ याद न करने पर ( वह ) दण्ड दिया था आदि । आज आपके कठोर अनुशासन, नियम कानून और शिक्षा से ही मैं तुच्छ इस स्थान पर पहुँचा हूँ । प्रातःकाल उठकर रघुनाथा । गुरु पितु मातु नवावै माथा । -------------- छठी के छात्र छेदी ने छत्तीस की जगह बत्तीस कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई । गुरुजी ने छङी उठाई । और मारने वाले ही थे कि छेदी ने कहा - खबरदार ! अगर मुझे मारा तो । मैं गिनती नहीं जानता । मगर RTE की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ । गणित में नहीं, हिंदी में समझाना आता है । गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जङवत हो गए । जो कल तक बोल नहीं पाता था । वो आज आँखें दिखा रहा था । शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके । कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नहीं हुआ था । वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे । इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था । आते ही उन्होंने छङी को तोड़ कर बाहर फेंका । और बोले - सरकार का आदेश नही पढ़ा ? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है । रिटायरमेंट नजदीक है । निलंबन की मार पड़ गई । तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे । बच्चे न पढ़ें, न सही ? पर प्रेम से पढ़ाओ । उनसे निवेदन करो ? अगर कही शिकायत कर दी तो ? बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए । मानो हर बूँद से प्रायश्चित टपक रहा हो । इधर छेदी गुरुजी ‘हाय हाय’ के नारे लगाता जा रहा था । और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए । प्रधानाध्यापक ने छेदी को एक कोने में ले जाकर कहा - मुझसे कहो, क्या चाहिए ? छेदी बोला - जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते हैं । हम विद्यालय का बहिष्कार करेंगे । बताए कि शिकायत पेटी कहाँ है ? समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय का वातावरण हो चुका था । छात्र जान चुके थे कि उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है । बड़े सर ने छेदी से कहा कि - मैं उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ । पर छेदी बोला - आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया । वही माफी माँगे । मेरा अपमान हुआ है । आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था । जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड, दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था । आज उनकी ये तीनों शक्तियां परास्त हो चुकी थी । वे इतने भयभीत हो चुके थे कि एकांत में छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे । लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरुता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे ।  छङी के संग उनका मनोबल ही नहीं, परंपरा और प्रणाली भी टूट चुकी थी । सारी व्यवस्था, नियम कानून एक्सपायर हो चुके थे । कानून क्या कहता है ? अब ये बच्चों से सीखना पङेगा । पाठयक्रम में अधिकारों का वर्णन था । कर्तव्यों का पता नही था । अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह में फँस जाएँगे । वे प्रण कर चुके थे कि कल से बच्चे जैसा कहेंगे । वैसा ही वे करेंगे । तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले - मैं आपको समझ रहा हूँ । वह मान गया है । और अंदर आ रहा है । उससे माफी माँग लो । समय की यही जरूरत है । छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया । और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए । कलम को चाहिए कि - यही थम जाए । कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है । ----------- ये व्यंग्य चित्र और व्यंग्य शब्द दोनों किन्हीं अज्ञात सृजकों के ‘प्रतिलिपि चेपन’ यानी आंग्ल भाषा में ‘कापी पेस्ट’ हैं ।  at 8:16 pm साझा करें 21 जुलाई 2016 ओशो स्त्री भी और पुरुष भी मेरे इस लिखित कथन पर - मैं ओशो या कृष्णमूर्ति के तरह निश्चित स्तरीय ( एक ही तल पर ) बात न कहकर सार्वभौमिक और मिश्रित अन्दाज में विषय रखता हूँ । क्योंकि नेट एक ऐसा स्कूल है । जिसमें पहली कक्षा से लेकर डाक्टरेट तक के लोग एक ही कक्ष में बैठे हैं । अतः बाद में प्रतिक्रिया में सभी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं । अब वह बात अलग है । उस विषय से किसमें क्या और किस स्तरीय क्रिया हुयी । ----------- ओशो समर्थक अंतरप्रकाश जी की प्रतिक्रिया ( संवाद और भी था । पर मूल यही है ) Rajeev Kulshreshtha जी, सन्ध्या नमन, क्या आप बतायेंगे कि अष्टावक्र गीता जनमानस में क्यों उपदेशित न हो सकी । और भगवत गीता जनमानस की उपयोगिता बन गई ? बाबा क्या आप ये भी बताने की अनुकम्पा करेंगे कि कृष्णमूर्ति क्यों आप्रासंगिक हो गये । और ओशो जनमानस में फैलते जा रहे है ? दर्जा एक के विद्यार्थियों को आप सीधे डाक्ट्रेट दे या दिला सकते है ? बाबा आपने जो पोस्ट स्टैट्स पर रखी है । क्या वह सार्वभौमिकता से सम्बध रखती है ? - बाबा आप कृपया मेरे चारो प्रश्नों के समाधान रखने की कृपा करें । ------------ क्या आप बतायेंगे कि अष्टावक्र गीता जनमानस में क्यों उपदेशित न हो सकी । और भगवत गीता जनमानस की उपयोगिता बन गई ? उत्तर - किसी भी मुख्यधारा से जुङे महत्वपूर्ण विषय को लेकर भिन्न भिन्न मानसिक स्तरों पर जो ग्राह्यता, प्रियता, अप्रियता बनती है । उसमें देश, समाज, काल, जाति, संस्कार, शिक्षा, वातावरण आदि जैसे कारकों की विशेष भूमिका रहती है । अष्टावक्र गीत, गीत नहीं महागीत है । क्योंकि यह सर्वदेशीय, सर्वात्मीय, सर्वव्यापक मगर एक आत्ममूल पर ही केन्द्रित है । इसके कथन अहं आधारित मनोविकारों को मिथ्या और भ्रामक बताते हुये आत्मा या निज स्वरूप के प्रति ही जाग्रति का आह्वान देते हैं । अष्टावक्र गीत का मूल स्वर यही है और यह अद्वैत और आत्ममूल पर ही है । जबकि द्वैत ( पर आधारित ) सामाजिकता और धर्म, अधर्म आदि द्वि पक्षों को लेकर भगवद गीत मनोविकारों का सिर्फ़ उपचार सा ही करता है । उसमें कर्ता भाव का त्याग कर अकर्ता हो जाने का प्रमुख उपदेश है । भगवत गीता का भगवान कहता है - तुम मेरी शरण में आ जाओ । मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा । जबकि अष्टावक्र गीता कहती है - कैसी शरण और कौन शरणदाता और कैसे पाप ? ऐसा तो कुछ है ही नहीं ।  अतः जैसा कि मैंने ऊपर कहा - दोनों के स्तर में जमीन आसमान का अन्तर है । गीता कहती है - इस गूढ़ ज्ञान को जानने के लिये किसी तत्वदर्शी को तलाश करो । ऐसी जगह, ऐसे टेङे सीधे होकर आसन लगाओ, ऐसे नाक का कोना देखो आदि..करो । तब तुम उसको जानोगे । अष्टावक्र गीता कहती है - सिर्फ़ बात को तल पर समझ लो । ये सब ध्यान आदि की आवश्यकता ही नहीं । क्योंकि खुद तुम्ही तुम हो । ---------- दोनों गीताओं पर आधारित उपरोक्त तथ्य बेहद उच्च स्तरीय हैं । जो सिर्फ़ प्रबुद्ध वर्ग का मानस ग्रहण कर पाता है । अतः आपके प्रश्न सार के अनुसार यह उत्तर उचित नही है । उपरोक्त सिर्फ़ विषय को स्पष्ट करने हेतु अधिक है । क्योंकि आपका प्रश्न सार सामान्य जनमानस और सामाजिकता पर केन्द्रित है । अतः उसके कारण अन्य हैं । महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत के लगभग वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय अंश भगवद गीता के वक्ता स्वयं श्रीकृष्ण हैं । जिनकी भारतीय हिन्दू अहिन्दू समाज में एक सर्वशक्तिमान छवि है । दरअसल में जिसके पीछे सिर्फ़ लालची भावनाओं की चाशनी अधिक लिपटी हुयी है । जैसे नरसी को करोङों का भात, अति निर्धन सुदामा को लोकपति बना देना, तमाम असुरों को खेल खेल में मार देना ( सुपरमेन ) सभी कुंवारियों विवाहित स्त्रियों का प्रेमी होना, तमाम चमत्कारिक और भक्तों को धन समृद्धि युक्त करने आदि आदि के हजारों वृतांत कृष्ण को ‘रोग अनेक दवा एक’ जैसा महत्वपूर्ण पद खुद दिला देते हैं । और इन सबसे भी बढ़कर कृष्ण की विष्णु अवतार, भगवान और त्रिलोकपति की छवि होना । यानी स्वर्ग नर्क, जन्म मरण, मोक्ष आदि सब उन्हीं के हाथों में । ऐसे व्यक्ति की चापलूसी कौन नहीं करेगा, सिर्फ़ ज्ञानी को छोङकर । अब आठ जगह से टेङे विकृत और लगभग कुरूप अष्टावक्र को, जिन्हें आज भी बहुत सा हिन्दू तक नहीं जानता । और बहुत हद जिनका परिचय एक ऋषि पिता द्वारा शापित पुत्र और जनक गुरु और एक स्वयं की गीता के उपदेशक जितना ही है । श्रीकृष्ण की सुन्दर सलौनी, मुरली बजईया, माखन चोर, नटखट बालक, सुन्दर बलिष्ठ किशोर, कुशल राजनेता, अजेय योद्धा, कुशल कूटनीतिज्ञ आदि आदि इतनी छवियां हैं कि वे आम जनमानस के सर्वप्रिय और सर्वविघ्नहारा हो ही जाते हैं । ये एक बेहद सुन्दर सुखद सपने जैसा है कि नहीं ? जबकि अष्टावक्र कहते हैं - काहे का राज, काहे का राजा, जनक तू पागल हुआ है क्या ? सब कुछ महज सपना है । महज भ्रांति । देखें - तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प ( कामना ) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है ।7। अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है । वह अपार शांति को प्राप्त करता है ।8। अध्याय 11 ये मैंने सिर्फ़ दो उदाहरण भर दिये हैं । अष्टावक्र के सभी उपदेश ही यही कहते हैं कि - कहाँ पागल हुये हो । अरे सब भ्रम ही है । विशेष - अब यदि आप भगवद गीता और अष्टावक्र गीता की तुलना न करके उनके वक्ताओं की तुलना से तुलना करेंगे । तो बात स्पष्ट हो जायेगी । --------- अब एक और भी मुख्य कारण - सृष्टि की संरचना जिस तरीके पर आधारित है । उसमें आत्मज्ञान कारणवश सिर्फ़ मुठ्ठी भर लोगों को ही सिद्ध होता है । अतः ये लोकप्रिय होने जैसा विषय ही नहीं है ।   ------------ बाबा क्या आप ये भी बताने की अनुकम्पा करेंगे कि कृष्णमूर्ति क्यों आप्रासंगिक हो गये । और ओशो जनमानस में फैलते जा रहे है ? उत्तर - ओशो अपने सरल स्वभाव के कारण भले ही कृष्णमूर्ति के विषय में कुछ भी कहें । मैं कृष्णमूर्ति पर बात करना व्यर्थ और सर्वथा महत्वहीन मानता हूँ । तथापि नास्तिक और भूत प्रेतों को पूजने वाले जैसे भांति भांति के जीव वर्ग यहाँ मौजूद हैं । तो फ़िर कृष्णमूर्ति उनके देखे, फ़िर भी ठीक हैं । इन दोनों को अध्ययन स्तर पर ही जानने वाला यदि निरपेक्ष तुलना करेगा । तो ओशो की लोकप्रियता और कृष्णमूर्ति की तुलनात्मक ओशो उपेक्षा सहज ज्ञात हो जाती है । ओशो के स्वर में सिर्फ़ विरोध नहीं है । अनुरोध भी है । उनमें सिर्फ़ रूखापन नहीं है । श्रंगार भी है । ओशो कङवे और मीठे दोनों हैं । ओशो ( व्यक्ति भाव अनुसार )  दुश्मन और मित्र दोनों हैं । ओशो एकांगी और सर्वांगी दोनों हैं । ओशो स्त्री भी हैं और पुरुष भी । ओशो शैतान भी है और भगवान भी । ओशो निरे पागल भी है और गहरे विवेकी भी । ओशो सरस और नीरस भी हैं । कुल मिलाकर यदि ओशो बेहद असामाजिक हैं तो गहरे सामाजिक भी । ओशो एक और बहुत दोनों हैं आदि । लेकिन कृष्णमूर्ति सिर्फ़ रूखे हैं । चिङचिङे हैं । जैसे पलायनवादी हैं । अजीब एकांगी हैं । नीरस हैं । वह कीचङ में निर्लेप कमल सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं करते । वह कहते हैं - या तो कीचङ ही  हटा दो । या फ़िर कमल का ही स्थान बदलो । दोनों साथ नहीं होने चाहिये । और ऐसा न कभी हुआ । न आगे हो सकता है । कमल को कीचङ में ही रहना होगा । अब वह लेपित रहे या निर्लेपित, यही उसका कौशल है । यह विषय कुछ अधिक विस्तार की मांग करता है । पर जिन्होंने अध्ययन किया होगा । वे इतने से समझ सकेंगे । ----------- दर्जा एक के विद्यार्थियों को आप सीधे डाक्ट्रेट दे या दिला सकते है ? उत्तर - आपने कथन भाव को समझने की पूर्ण कोशिश नहीं की । फ़िर से गौर करिये -  क्योंकि नेट एक ऐसा स्कूल है । जिसमें पहली कक्षा से लेकर डाक्टरेट तक के लोग ‘एक ही कक्ष’ में बैठे हैं । अतः बाद में प्रतिक्रिया में सभी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं । अब वह बात अलग है । उस विषय से किसमें क्या और किस स्तरीय क्रिया हुयी । दर्जा एक छोङिये । दस दर्जा या फ़िर अधिक को भी दूसरे द्वारा नहीं दिलाया जा सकता । लेकिन किसी भी प्रस्तुति को लेकर उसकी साधारण जिज्ञासा, गहन जिज्ञासा, रुचि, चिढ़, तिरस्कार आदि आदि क्या प्रतिक्रिया रही । यह महत्वपूर्ण है । क्योंकि प्रतिक्रिया कुछ भी क्यों न हो । वह विषय को आगे ही बढ़ायेगी और स्पष्ट भी करेगी । अतः कक्षायें और स्तर बदलते ही रहेंगे । ------------ बाबा आपने जो पोस्ट स्टेटस पर रखी है । क्या वह सार्वभौमिकता से सम्बध रखती है ? उत्तर - सृष्टि का एक अति तुच्छ कण भी सर्वदा सार्वभौमिक ही है । तिनका कबहुं न निन्दिये, पांव तले जो होय । कबहु उङ आंखन परे, पीर घनेरी होय । अब आप अपने अन्तिम दो प्रश्नों पर विचारें । तो उत्तर स्वयं ही स्पष्ट हो जायेगा । फ़ेसबुक की इसी पोस्ट पर बहुस्तरीय प्रतिक्रियायें देखें ( दर्जा एक के विद्यार्थियों को आप सीधे डाक्ट्रेट ) एक ही पोस्ट पर कितने कृम बने ? और सार्वभौमिकता की बात यह है कि जैसा कि मैंने ऊपर कहा - अतः बाद में प्रतिक्रिया में सभी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं । अब वह बात अलग है । उस विषय से किसमें क्या और किस स्तरीय क्रिया हुयी । खास सिर्फ़ एक अंतरप्रकाश की हलचल के आधार पर इसने कितना विस्तार ले लिया ? नेट पर इसका बीजारोपङ हो गया । अतः आगे कितना सार्वभौम हो सकता है ? यह कहा नहीं जा  सकता । at 9:46 pm साझा करें 17 जुलाई 2016 अष्टावक्र महागीता 1 अध्याय 1 जनक, अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है । मुक्ति कैसे प्राप्त होती है । वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बताएं ।1। अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये । क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये ।2। आप न पृथ्वी हैं, न जल न अग्नि न वायु अथवा आकाश ही हैं । मुक्ति के लिए इन तत्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए ।3। यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें । तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे ।4। आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं । तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ ।5। धर्म, अधर्म, सुख, दुख मस्तिष्क से जुड़ें हैं । सर्व व्यापक आपसे नहीं । न आप करने वाले हैं । और न भोगने वाले हैं । आप सदा मुक्त ही हैं ।6। आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं ।7। अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेते हैं । ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’ इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाईये ।8। मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें । इस प्रकार शोक रहित होकर सुखी हो जाएँ ।9। जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे । उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें ।10। स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है । यह कहावत सत्य ही है कि - जैसी बुद्धि होती है । वैसी ही गति होती है ।11। आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छारहित एवं शांत है । भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है ।12। अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और ‘मैं’ के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें ।13। हे पुत्र ! बहुत समय से आप ‘मैं शरीर हूँ’ इस भाव बंधन से बंधे हैं । स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ ।14। आप असंग, अक्रिय, स्वयं प्रकाशवान तथा सर्वथा दोष मुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा मस्तिष्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ।15। यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है । वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और ज्ञान स्वरुप हो । छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो ।16। आप इच्छा रहित, विकार रहित, घन (ठोस) शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये ।17। आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये । इस तत्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है ।18। जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी । उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी ।19। जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है । उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है ।20। -------------- अध्याय 2 जनक कहते हैं - आश्चर्य ! मैं निष्कलंक, शांत, प्रकृति से परे, ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया ।1। जिस प्रकार मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ, उसी प्रकार इस विश्व को भी । अतः मैं यह समस्त विश्व ही हूँ अथवा कुछ भी नहीं ।2। अब शरीर सहित इस विश्व को त्याग कर किसी कौशल द्वारा ही मेरे द्वारा परमात्मा का दर्शन किया जाता है ।3। जिस प्रकार पानी लहर, फेन और बुलबुलों से पृथक नहीं है । उसी प्रकार आत्मा भी स्वयं से निकले इस विश्व से अलग नहीं है ।4। जिस प्रकार विचार करने पर वस्त्र तंतु (धागा) मात्र ही ज्ञात होता है । उसी प्रकार यह समस्त विश्व आत्मा मात्र ही है ।5। जिस प्रकार गन्ने के रस से बनी शक्कर उससे ही व्याप्त होती है । उसी प्रकार यह विश्व मुझसे ही बना है । और निरंतर मुझसे ही व्याप्त है ।6। आत्मा अज्ञानवश ही विश्व के रूप में दिखाई देती है । आत्मज्ञान होने पर यह विश्व दिखाई नहीं देता है । रस्सी अज्ञानवश सर्प जैसी दिखाई देती है । रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प दिखाई नहीं देता है ।7। प्रकाश मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त मैं कुछ और नहीं हूँ । वह प्रकाश जैसे इस विश्व को प्रकाशित करता है । वैसे ही इस ‘मैं’ भाव को भी ।8। आश्चर्य, यह कल्पित विश्व अज्ञान से मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में सर्प और सूर्य किरणों में पानी ।9। मुझसे उत्पन्न हुआ विश्व मुझमें ही विलीन हो जाता है जैसे घड़ा मिटटी में, लहर जल में और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है ।10। आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है । समस्त विश्व के नष्ट हो जाने पर भी जिसका विनाश नहीं होता । जो तृण से ब्रह्मा तक सबका विनाश होने पर भी विद्यमान रहता है ।11। आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला होते हुए भी जो न कहीं जाता है । और न कहीं आता है । और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है ।12। आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान कोई और नहीं है । जिसने इस शरीर को बिना स्पर्श करते हुए इस विश्व को अनादि काल से धारण किया हुआ है ।13। आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जिसका यह कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी वाणी और मन से समझ में आता है । वह सब जिसका है ।14। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं । यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है । वह निष्कलंक मैं ही हूँ ।15। द्वैत (भेद) सभी दुखों का मूल कारण है । इसकी इसके अतिरिक्त कोई और औषधि नहीं है कि यह सब जो दिखाई दे रहा है । वह सब असत्य है । मैं एक, चैतन्य और निर्मल हूँ ।16। मैं केवल ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही मेरे द्वारा स्वयं में अन्य गुण कल्पित किये गए हैं । ऐसा विचार करके मैं सनातन और कारण रहित रूप से स्थित हूँ ।17। न मुझे कोई बंधन है और न कोई मुक्ति का भ्रम । मैं शांत और आश्रय रहित हूँ । मुझमें स्थित यह विश्व भी वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है ।18।  यह निश्चित है कि इस शरीर सहित यह विश्व अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध, चैतन्य आत्मा का ही अस्तित्व है । अब इसमें क्या कल्पना की जाये ।19। शरीर, स्वर्ग, नरक, बंधन, मोक्ष और भय ये सब कल्पना मात्र ही हैं । इनसे मुझ चैतन्य स्वरुप का क्या प्रयोजन है ।20। आश्चर्य कि मैं लोगों के समूह मंत भी दूसरे को नहीं देखता हूँ । वह भी निर्जन ही प्रतीत होता है । अब मैं किससे मोह करूँ ।21। न मैं शरीर हूँ । न यह शरीर ही मेरा है । न मैं जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर जीने की इच्छा ही मेरा बंधन थी ।22। आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु उठने पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंगें उपस्थित हो जाती हैं ।23। मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु के शांत होने पर जीव रूपी वणिक का संसार रूपी जहाज जैसे दुर्भाग्य से नष्ट हो जाता है ।24। आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में जीव रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं और स्वभाव से मुझमें प्रवेश कर जाती हैं ।25। -------------- अध्याय 3 अष्टावक्र कहते हैं - आत्मा को अविनाशी और एक जानो । उस आत्मज्ञान को प्राप्त कर, किसी बुद्धिमान व्यक्ति की रूचि धन अर्जित करने में कैसे हो सकती है ।1। स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है । जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ।2। सागर से लहरों के समान जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है । वह मैं ही हूँ । जानकर तुम एक दीन जैसे कैसे भाग सकते हो ।3। यह सुनकर भी कि आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है । तुम कैसे जननेंद्रिय में आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त हो सकते हो ।4। सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सब प्राणियों को जानने वाले मुनि में ममता की भावना का बने रहना आश्चर्य ही है ।5।  एक ब्रह्म का आश्रय लेने वाले और मोक्ष के अर्थ का ज्ञान रखने वाले का आमोद प्रमोद द्वारा उत्पन्न कामनाओं से विचलित होना आश्चर्य ही है ।6। अंत समय के निकट पहुँच चुके व्यक्ति का उत्पन्न ज्ञान के अमित्र काम की इच्छा रखना, जिसको धारण करने में वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है ।7। इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य और अनित्य का ज्ञान रखने वाले और मोक्ष की कामना रखने वालों का मोक्ष से डरना, आश्चर्य ही है ।8। सदा केवल आत्मा का दर्शन करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भोजन कराने पर या पीड़ित करने पर न प्रसन्न होते हैं  और न क्रोध ही करते हैं ।9।  अपने कार्यशील शरीर को दूसरों के शरीरों की तरह देखने वाले महापुरुषों को प्रशंसा या निंदा कैसे विचलित कर सकती है ।10। समस्त जिज्ञासाओं से रहित, इस विश्व को माया में कल्पित देखने वाले, स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को आसन्न मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ।11। निराशा में भी समस्त इच्छाओं से रहित, स्वयं के ज्ञान से प्रसन्न महात्मा की तुलना किससे की जा सकती है ।12। स्वभाव से ही विश्व को दृश्यमान जानो । इसका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य, देखने वाला स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति क्या देखता है ? ।13। विषयों की आतंरिक आसक्ति का त्याग करने वाले, संदेह से परे, बिना किसी इच्छा वाले व्यक्ति को स्वतः आने वाले भोग न दुखी कर सकते है और न सुखी ।14। ----------- अध्याय 4 अष्टावक्र कहते हैं - स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है । उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव) लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ।1। जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं । उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ।2। उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है । जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुंयें से आकाश का संयोग नहीं होता है ।3। जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है । उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ।4। ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ।5। आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है । जो ऐसा जान जाता है । उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ।6। -------------- अध्याय 5 अष्टावक्र कहते हैं - तुम्हारा किसी से भी संयोग नहीं है । तुम शुद्ध हो । तुम क्या त्यागना चाहते हो । इस (अवास्तविक) सम्मिलन को समाप्त कर के ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।1। जिस प्रकार समुद्र से बुलबुले उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार विश्व एक आत्मा से ही उत्पन्न होता है । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।2। यद्यपि यह विश्व आँखों से दिखाई देता है परन्तु अवास्तविक है । विशुद्ध तुम में इस विश्व का अस्तित्व उसी प्रकार नहीं है । जिस प्रकार कल्पित सर्प का रस्सी में । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।3। स्वयं को सुख और दुःख में समान, पूर्ण, आशा और निराशा में समान, जीवन और मृत्यु में समान, सत्य जानकर ब्रह्म से योग ( एकरूपता ) को प्राप्त करो ।4। at 9:32 pm साझा करें अष्टावक्र महागीता 2 अध्याय 6 अष्टावक्र कहते हैं - आकाश के समान मैं अनंत हूँ और यह जगत घड़े के समान महत्वहीन है । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।1। मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।2। यह विश्व मुझमें वैसे ही कल्पित है जैसे कि सीप में चाँदी । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।3। मैं समस्त प्राणियों में हूँ । जैसे सभी प्राणी मुझमें हैं । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।4। ------------- अध्याय 7 जनक कहते हैं - मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ।1। मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं । इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ।2। मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ।3। उस अनंत और निरंजन अवस्था में न ‘मैं‘ का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ।4। आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है । इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ।5। -------------- अध्याय 8 अष्टावक्र कहते हैं - तब बंधन है । जब मन इच्छा करता है । शोक करता है । कुछ त्याग करता है । कुछ ग्रहण करता है । कभी प्रसन्न होता है । या कभी क्रोधित होता है ।1। तब मुक्ति है । जब मन इच्छा नहीं करता है । शोक नहीं करता है । त्याग नहीं करता है । ग्रहण नहीं करता है । प्रसन्न नहीं होता है । या क्रोधित नहीं होता है ।2। तब बंधन है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्त है । तब मुक्ति है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्ति रहित है ।3। जब तक ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव है । तब तक बंधन है । जब ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव नहीं है । तब मुक्ति है । यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही करो ।4। ---------------- अध्याय 9 अष्टावक्र कहते हैं - यह कार्य करने योग्य है अथवा न करने योग्य और ऐसे ही अन्य द्वंद्व (हाँ या न रूपी संशय) कब और किसके शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके विरक्त (उदासीन) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का पालन न करने वाले बनो ।1। हे पुत्र ! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देख कर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है ।2। यह सब अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है ।3। ऐसा कौन सा समय अथवा उम्र है । जब मनुष्य के संशय नहीं रहे हैं । अतः संशयों की उपेक्षा करके अनायास सिद्धि को प्राप्त करो ।4। महर्षियों, साधुओं और योगियों के विभिन्न मतों को देखकर कौन मनुष्य वैराग्यवान होकर शांत नहीं हो जायेगा ।5। चैतन्य का साक्षात ज्ञान प्राप्त करके कौन वैराग्य और समता से युक्त कौन गुरु जन्म और मृत्यु के बंधन से तार नहीं देगा ।6। तत्वों के विकार को वास्तव में उनकी मात्रा के परिवर्तन के रूप में देखो । ऐसा देखते ही उसी क्षण तुम बंधन से मुक्त होकर अपने स्वरुप में स्थित हो जाओगे ।7।  इच्छा ही संसार है । ऐसा जानकर सबका त्याग कर दो । उस त्याग से इच्छाओं का त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी यथारूप अपने स्वरुप में स्थिति हो जाएगी ।8। ---------------- अध्याय 10 अष्टावक्र कहते हैं - कामना और अनर्थों के समूह धन रूपी शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के त्याग रूपी धर्म से युक्त होकर सर्वत्र विरक्त (उदासीन) हो जाओ ।1। मित्र, जमीन, कोषागार, पत्नी और अन्य संपत्तियों को स्वप्न की माया के समान तीन या पाँच दिनों में नष्ट होने वाला देखो ।2। जहाँ जहाँ आसक्ति हो । उसको ही संसार जानो । इस प्रकार परिपक्व वैराग्य के आश्रय में तृष्णा रहित होकर सुखी हो जाओ ।3। तृष्णा (कामना) मात्र ही स्वयं का बंधन है । उसके नाश को मोक्ष कहा जाता है । संसार में अनासक्ति से ही निरंतर आनंद की प्राप्ति होती है ।4। तुम एक (अद्वितीय) चेतन और शुद्ध हो तथा यह विश्व अचेतन और असत्य है । तुममें अज्ञान का लेश मात्र भी नहीं है और जानने की इच्छा भी नहीं है ।5। पूर्व जन्मों में बहुत बार तुम्हारे राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुखों का, तुम्हारी आसक्ति होने पर भी नाश हो चुका है ।6। पर्याप्त धन, इच्छाओं और शुभ कर्मों द्वारा भी इस संसार रूपी माया से मन को शांति नहीं मिली ।7। कितने जन्मों में शरीर, मन और वाणी से दुःख के कारण कर्मों को तुमने नहीं किया ? अब उनसे उपरत (विरक्त) हो जाओ ।8। ----------------- अध्याय 11 अष्टावक्र कहते हैं - भाव (सृष्टि, स्थिति) और अभाव (प्रलय, मृत्यु) रूपी विकार स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकार रहित, दुख रहित होकर सुख पूर्वक शांति को प्राप्त हो जाता है ।1। ईश्वर सबका सृष्टा है कोई अन्य नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाले की सभी आन्तरिक इच्छाओं का नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित हो जाता है ।2। संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है । वह न इच्छा करता है और न शोक ।3। सुख दुख और जन्म मृत्यु प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, फल की इच्छा न रखने वाला, सरलता से कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता है ।4। चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।5।  न मैं यह शरीर हूँ । और न यह शरीर मेरा है । मैं ज्ञान स्वरुप हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है । वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ।6। तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प (कामना) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है ।7। अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है । वह अपार शांति को प्राप्त करता है ।8। ----------------- अध्याय 12 जनक कहते हैं - पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ | फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ । अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।1। शब्द आदि विषयों में आसक्ति रहित होकर और आत्मा के दृष्टि का विषय न होने के कारण मैं निश्चल और एकाग्र ह्रदय से अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।2। अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।3। हे ब्रह्म को जानने वाले ! त्याज्य (छोड़ने योग्य) और संग्रहणीय से दूर होकर और सुख दुख के अभाव में मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।4। आश्रम अनाश्रम, ध्यान और मन द्वारा स्वीकृत और निषिद्ध नियमों को देख कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।5। कर्मों के अनुष्ठान रूपी अज्ञान से निवृत्त होकर और तत्व को सम्यक रूप से जान कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।6। अचिन्त्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए भी विचार पर ही चिंतन किया जाता है । अतः उस विचार का भी परित्याग करके मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।7। जो इस प्रकार से आचरण करता है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है । जिसका इस प्रकार का स्वभाव है । वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है ।8। ----------------- अध्याय 13 जनक कहते हैं - अकिंचन (कुछ अपना न) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।1। शारीरिक दुःख भी कहाँ (अर्थात नहीं) हैं । वाणी के दुख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।2। किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्व पूर्वक विचार करके, जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।3। शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं  पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।4। विश्राम, गति, शयन, बैठने, चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं । अतः सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।5। सोने में मेरी हानि नहीं है और उद्योग अथवा अनुद्योग में मेरा लाभ नहीं है । अतः हर्ष और शोक की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमानहूँ ।6। सुख, दुख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके, शुभ (अच्छे) और अशुभ (बुरे) की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।7। -------------- अध्याय 14 जनक कहते हैं - जो स्वभाव से ही विचार शून्य है और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों  से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से ।1। जब मैं कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन, मित्रों, विषयों, शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है ।2। साक्षी पुरुष रूपी परमात्मा या ईश्वर को जानकर मैं बंधन और मोक्ष से निरपेक्ष हो गया हूँ और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है ।3। आतंरिक इच्छाओं से रहित, बाह्य रूप में चिंता रहित आचरण वाले, प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं ।4। -------------- अध्याय 15 अष्टावक्र कहते हैं - सात्विक बुद्धि से युक्त मनुष्य साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य (मुक्त) हो जाता है परन्तु ऐसा न होने पर आजीवन जिज्ञासु होने पर भी परब्रह्म का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है ।1। विषयों से उदासीन होना मोक्ष है और विषयों में रस लेना बंधन है । ऐसा जानकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा ही करो ।2। वाणी, बुद्धि और कर्मों से महान कार्य करने वाले मनुष्यों को तत्व ज्ञान शांत, स्तब्ध और कर्म न करने वाला बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले इसका त्याग कर देते हैं ।3। न तुम शरीर हो और न यह शरीर तुम्हारा है । न ही तुम भोगने वाले अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।4। राग (प्रियता) और द्वेष (अप्रियता) मन के धर्म हैं और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो । तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।5। समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ ।6। इस विश्व की उत्पत्ति तुमसे उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से लहरों की, इसमें संदेह नहीं है ।  तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ ।7।  हे प्रिय ! इस अनुभव पर निष्ठा रखो । इस पर श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे और आत्म स्वरुप भगवान हो ।8। गुणों से निर्मित यह शरीर स्थिति, जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है और  न ही जाती है ।  at 9:24 pm साझा करें 12 जुलाई 2016 जिन्न लोक में पहले मैंने इस घटना को अगले ही दिन प्रकाशित करने का विचार किया । परन्तु फ़िर यह उचित नहीं लगा और धीरे धीरे विचार हटता गया । लेकिन कल अचानक फ़िर लगा कि इसे बता देना चाहिये । वह कोई 26 जून के आसपास की रात थी । उमस भरी भयानक गर्मी जैसे अपनी चरम सीमा पर थी । मेरे बिस्तर के ठीक सिरहाने रखा कूलर भले ही पानी की नन्हीं नन्हीं बूंदों के साथ ठंडी हवा फ़ेंकने का प्रयास सा कर रहा था पर भट्टी जैसे तपते वातावरण से वह भी मानों परास्त हो रहा था । कूलर के अतिरिक्त एक टेबल फ़ैन बिस्तर के ठीक साइड में रखा था । और बिस्तर के दूसरी साइड में 4 फ़ुट ऊँची 6 फ़ुट लम्बी खिङकी पूरी तरह से खुली हुयी थी । खिङकी के बाहर हजार वर्ग गज से भी अधिक खुला स्थान था और अन्य मकान तथा उनकी दीवारें काफ़ी दूर ही थे । घर के आसपास का अन्य भाग भी अधिक संकुचित congested नहीं था । फ़िर भी गर्मी का यह हाल था । मानों आग की छोटी छोटी चिनगियां सी कभी कभार बरस रही हों । भयंकर उमस के ऐसे वातावरण में छोटे छोटे कीट पतंगे ठंडे स्थानों की ओर स्वाभाविक ही भागते हैं । सो मेरे बिस्तर पर भी कोई दस बीस कीट आराम से आ चुके थे । और कुछ मेरे वस्त्रों में घुस कर गर्मी का गुस्सा मुझ पर उतारते हुये काट रहे थे । और कई कारणों से सिवाय सहने के मेरे पास इन सब संकटों का कोई हल नहीं था । खुद को शान्त रखना अति मुश्किल हो रहा था । फ़िर जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो मैंने शीतली प्राणायाम, समाधि आदि जैसे कुछ विकल्पों पर विचार किया । परन्तु क्रियान्वित करने में असफ़ल रहा । इसी बीच मैंने सेलफ़ोन में एक बार समय देखा । तो 11:10 हो चुके थे । एक बार को तो मुझे लगा कि लेटने के बजाय बैठ जाना उचित है । क्योंकि बैठ कर गर्मी कम लगती है । लेकिन फ़िर मैंने इरादा टाल दिया । और जाही विधि राखे राम..जैसा सन्तोषप्रद विचार मनन करते हुये खुद को शान्त करने की कोशिश करने लगा ।  लेकिन उस वक्त तक मैं नहीं जानता था कि मेरे साथ कुछ ही देर में क्या घटने वाला है ? 11:10 के बाद शायद आधा घन्टा और हुआ होगा कि गर्मी और शरीर पर रखे हाथ के दबाव से यकायक मेरी चेतना शून्य हो गयी । अब गर्मी का कोई अहसास तक न था । और सुखद शीतलता एक आनन्द सा दे रही थी । तभी मेरे कन्धे और कमर पर एक अजीब सा तीवृ बल महसूस हुआ और दो दस बारह साल के मजबूत ( लेकिन उसके कुछ मिनटों बाद ही पता लगा ) बच्चों के साये का  मुझे आभास हुआ । वे मुझे उठाने के लिये बल प्रयोग कर रहे थे । पर उन्हें जैसे कठिनाई सी हो रही थी । वे जिन्न बच्चे थे । लेकिन यह बात मुझे बाद में पता लगी । प्रेतों और जिन्नों के साथ मेरा ये कोई नया अनुभव नहीं था । और मेरा उस वक्त उनसे व्यवहार भी सामान्य लोगों की भांति नहीं होता । सामान्य लोग ऐसे में गिगिया कर चीख पङते हैं । उनको हांफ़नी सी आती है और कभी कभी भयभीत होकर वे कहते हैं - ओ रे दईया..लिये जात है..आदि । पर मेरे साथ ऐसा नहीं था । मैं केवल शान्त और निष्क्रिय ही था और उनके बल का अनुभव कर रहा था । दोनों जिन्न बच्चे अन्दाजन कोई आठ मिनट मुझे उठाने की चेष्टा करते रहे । दस बारह की आयु समान दिखने वाले कोई ढ़ाई फ़ुट लम्बे इन बच्चों का बल किसी हष्ट पुष्ट पहलवान जैसा ही था । कभी कभी बीच में वे कोई अस्पष्ट सा शब्द बोलते । फ़िर जैसे खिसियाकर उन्होंने मेरे बेड की दिशा बदलते हुये उसे पूर्व ( सिरहाना ) पश्चिम से दक्षिण ( सिरहाना ) उत्तर कर दिया । और फ़िर कुछ किलकारियां सी भरी । बीच में उनकी किसी हरकत से तंग आकर मैंने उन्हें गाली भी दी । इसके बाद उन्होंने मेरे तकिये के ऊपरी हिस्से की रुई में आग लगा दी । रुई जलने की गन्ध के साथ ही धुंआ उठने लगा । जिन्न अक्सर ही ऐसा करते हैं । चारपाई, आदमी या अन्य वस्तुओं की उठापटक तथा कभी कभी मेज कुर्सी चारपाई आदि चीजों को तोङने लगते हैं । जब तकिये से धुंआ उठ रहा था । मैंने उन्हें पुनः गाली दी । फ़िर जाने क्यों उन्होंने तकिया बुझा दिया ( मुझे लगता है तकिया जलाना उनके किसी से सम्पर्क या अन्य क्रिया हेतु था । जिसका परिणाम तुरन्त हुआ ) और इसके ठीक अगले क्षण मैं यहाँ ( चित्र देखें ) जिन्न लोक में था । यह चित्र मैंने लगभग वैसा ही बनाया है । तथापि उतना अच्छा चित्रकार न होने से हूबहू नहीं बना सका । और कुछ भाग छूट गया । क्योंकि जो दृष्टि पटल हुआ । वह दायरा अधिक था । जिन्न लोक में पहुँचते ही मैं सबसे पहले उस स्थान पर गर्ल 1 के पास गया । जो बाहरी आंगन से हटकर अन्दर के आंगन में बैठी थी । मुझे ध्यान नहीं, मैंने उससे क्या कहा । फ़िर वह और मैं दोनों साथ साथ बाहर चारपाई के पास ( देखें डाटेड रेखा ) आ गये । वह वहाँ बैठे आदमी से कुछ बोली ।  जबकि उस वक्त मेरी निगाह सीधी बगल वाले घर में गयी । जिसमें एक किशोर वयः की नाटे कद और कुछ ही चौङी देह की लङकी जैसे गम्भीर रूप से परीक्षा की तैयारी में हाथ में किताब पकङे हुये चलती हुयी पढ़ रही थी । उसने एकाएक मेरी तरफ़ देखा । हमारी निगाहें मिली । उसकी प्रतिक्रिया उस परिचित घर में मुझ अजनबी को देखकर साधारण चौंकने जैसी ही हुयी । और वह फ़िर से किताब देखने लगी । लेकिन मैं उसे और उस घर को ही देखता रहा । उसी समय उसी घर में एक जवान महिला दरवाजे से बाहर निकल कर घर के दूसरे हिस्से की तरफ़ जाने लगी । जिधर रसोई जैसा कुछ लग रहा था । और उधर से एक जवान लङकी दरवाजे की तरफ़ जाने लगी ( ये दोनों लम्बाई आदि को लेकर औसत शरीर की थीं ) लेकिन पढ़ने वाली लङकी वहीं रही और किताब में ही ध्यान रखे थी । बगल वाले घर की सभी लङकियां साफ़ और गेहुंआ रंग की ही थी । लेकिन मेरे साथ वाली लङकी अधिक सांवली, दुबली और करीब पाँच फ़ुट लम्बी थी । दोनों बच्चे भी अधिक सांवले थे । लेकिन चारपाई पर बैठा अधेङ पुरुष गेहुंआ से कुछ अधिक पीला सा था और तब मजबूत देह का था । मैं बङे आराम से खङा हुआ वह सब देख रहा था । और वहाँ कुछ देर रुकना भी चाहता था । अतः प्रथमदृष्टया ही मेरे मन में आया कि शायद ये यक्ष लोक है । और मेरा यही विचार बनने लगा था । लेकिन वहाँ एक बात मुझे खटक रही थी कि सभी स्त्री वर्ग के वक्ष उभार बेहद मामूली से थे । और मेरे साथ वाली लङकी तो जैसे सपाट थी । जबकि उसकी आयु बीस से ऊपर की थी । अतः ये यक्ष लोक कदापि नहीं था । जब गर्ल 1 चारपाई पर बैठे उस अधेङ आदमी से बात कर रही थी । मैं बगल वाले घर की तरफ़ ही देख रहा था । इन दोनों मकानों के बीच अन्तर के लिये सिर्फ़ तीन फ़ुट उँची दीवार ही थी । और उस बगल वाले घर के आगे जो मिले हुये मकान थे । उनमें भी लगभग इतनी ही दीवार थी । मकानों की बनावट कुछ ऐसी थी कि मुझे बगल वाले मकान की तरफ़ देखने से दूर तक के मकान नजर आ रहे थे और ऊपर नीला आकाश फ़ैला हुआ था । बगल वाले घर की लङकी के वस्त्र सफ़ेद और कुछ गुलाबी रंग मिली डिजायन वाले थे । अधेङ कुर्ता पायजामा पहने था । बच्चे साधारण नेकर कमीज पहने थे । और मेरे साथ वाली लङकी लाल में जामुनी रंग मिले हुये वस्त्र पहने थी । तब फ़िर मेरी निगाह उस घर को देखने लगी । जिसमें मैं खङा था । इसी चारपाई से थोङा हटकर दो मंजिला मकान की ऊँचाई के बराबर मेरे लिये कोई अपरिचित वृक्ष खङा था । और उसी वृक्ष के साइड से मकान के किसी भाग में जाने हेतु एक रास्ता था ।  मैं सबसे पहले जिस लङकी के पास गया । उस भाग में पिछली दीवाल दो मंजिला से भी अधिक उँची थी । यह सब मैंने उतनी देर में आराम से देखा । जब वह अधेङ और उसके पीछे कुछ झुकी खङी गर्ल 1 पासपोर्ट साइज के कुछ रंगीन फ़ोटो देख कर कुछ मिलान सा कर रहे थे । और बच्चे आपस में कुछ बातें सी करते हुये आपस में एक दूसरे की तरफ़ देख रहे थे । इतनी ही देर में मुझे निश्चय हो गया कि यह जिन्न लोक ही है ।   इस गर्ल 1 की मृत्यु लगभग 2011 में 48 आयु में हुयी थी । और चारपाई पर बैठा अधेङ आदमी उसका पिता था । जिसकी मृत्यु लगभग 2007-8 में 72 आयु में हुयी थी । उस समय जब वह जीवित थे । मैंने उन्हें अच्छे परिचित के तौर पर देखा था । कुछ समय का साथ जैसा भी था । यह व्यक्ति जो अभी मजबूत अधेङ लग रहा था । जीवित रहने पर थोङी ही शक्ति वाला वृद्ध था । और अपने ही एकमात्र पुत्र द्वारा गांव के बाहर खुले तालाब के पास कुछ दिनों की यन्त्रणा के बाद पुत्र और उसके साथियों द्वारा जमा धन प्राप्त करने के लालच में मार दिया गया था । यह अलग बात थी । वह थोङा ही पैसा उसके हाथ आया था और शेष धन उसकी इसी जीवित और एकमात्र रह गयी पुत्री को मिल गया था । क्योंकि वृद्ध की पत्नी इससे भी कुछ अधिक पहले बीमारी से चल बसी थी । वृद्ध का पुत्र जिसने पिता की हत्या की, लगभग 45 आयु का और बेहद शराबी था । पिता के मरने के एक डेढ़ साल बाद स्वयं उसे भी उसके साथियों ने ही उसी तालाब में डुबो कर मार दिया । लेकिन अब वह इस जिन्न परिवार में नही था । या मेरे जाने के समय नही था । इस तरह इस परिवार के सभी लोग अकाल मृत्यु को ही प्राप्त हुये थे । जिनमें यह लङकी और उसका पिता मृत्यु के बाद मुझे 26 जून के आसपास फ़िर मिले थे । लेकिन उन दोनों के अलावा वह बच्चे और अन्य सभी मेरे लिये अपरिचित थे । जीवित पर ही उस लङकी से मुझे पता चला कि उसके कुछ भाई छोटी अवस्था में ही मर गये थे । शायद वे जिन्न बच्चे उन्हीं में से हों । लेकिन उनकी मृत्यु अधिक बालपन में हुयी थी । परन्तु जैसा कि वहाँ सभी की मृत्यु समय आयु से वर्तमान आयु में, शरीर में काफ़ी फ़र्क था । वैसा ही उनके साथ भी हो सकता था । क्योंकि जिन्न बच्चे बिलकुल परिवारी बच्चों सा व्यवहार कर रहे थे । जिन्न लोक के सर्वप्रथम क्षणों में जब में परिचित लङकी के पास गया । उसने एक लम्बे अन्तराल के बाद मिलने की दिली खुशी सी चेहरे से प्रकट की । उसका पिता भी सामान्य प्रसन्न और मेरे लिये मेहमानबाजी की भांति व्यवहार कर रहा था ।  फ़िर उसके पिता ने हाथ में पकङे हुये फ़ोटो को देखते हुये इंकार जैसा भाव बनाया और दूसरे ही क्षण में अपने कमरे में वापिस बिस्तर पर था । मुझे इतनी शीघ्र वापिस होने की झुंझलाहट सी हुयी । पर मैं कुछ कर भी नहीं सकता था ।     --------- तथ्य - जिन्न भूत प्रेत आदि के बारे में अज्ञानतावश आम धारणा उनके डरावने चेहरे या अन्य रूप अजीब से शरीर आदि को लेकर होती है । जबकि ऐसी सभी सूक्ष्म योनियों के शरीर एकदम मानव शरीर जैसे ही होते हैं । केवल उनके प्रेत शरीर के अलावा बाहर से देखने में उनमें और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं होता । लेकिन एक ताकतवर मनुष्य के तुलना में इनमें 6 गुना अधिक ताकत होती है । - वहाँ के मकानों का फ़र्श या तो कच्चा था । या फ़िर उसमें लगी चीजें बिलकुल मिट्टी के समान रंग की थी । लेकिन फ़र्श एकदम संगमरमरी फ़र्श जैसा सख्त और चिकना था । बगल वाले मकान की दरवाजे वाली दीवाल जैसे सीमेंट और ईंटों से बनी थी । लेकिन उस पर प्लास्टर नहीं था । जबकि कुछ अन्य दीवालें प्लास्टर जैसी थीं । ईंट की मोटाई भी करीब 6 इंच थी और लम्बाई लगभग 10 इंच की । - मुझे थोङी हैरानी उस जिन्न के हाथ में पकङे फ़ोटोज को लेकर थी । रंगीन नये और पासपोर्ट साइज के फ़ोटो । लेकिन फ़िर हैरानी नहीं भी थी । - उन दोनों मकानों में किसी भी प्रकार का कोई सामान या वस्तु आदि कुछ भी नहीं था । और सफ़ाई इतनी थी कि एक तिनका भी नजर न आये । इसका कारण शायद यही था । अच्छी स्थिति वाले जिन्न आवश्यक वस्तु, भोजन आदि जो उन्हें चाहिये । उसी रूप में उपलब्ध कर सकते हैं । इसी कारण मुझे आधुनिक फ़ोटो देखकर हैरानी नहीं हुयी थी । ऐसे अधिकांश लोकों में वर्षा, धूप, धूल, आंधी तूफ़ान जैसा कुछ नहीं होता । अतः सफ़ाई स्वयं ही रहती है । मौसम लगभग प्रातः 5 बजे जैसा होता है । और उतना ही उजाला होता है । सर्दी गर्मी आदि नहीं होते ।  महत्वपूर्ण - जिन्न बच्चों ने जो मुझे दक्षिण दिशा में सिर और उत्तर की ओर पैर किये थे । ये उनका मुझे ले जाने के लिये तरीका था । यदि ऐसा नहीं करते तो नहीं ले जा पाते । सूक्ष्म शरीरों का कोई चुम्बकत्व गुण नियम यहाँ लागू होता है । हवा में उठाकर जो तकिया जलाया । वह भी ले जाने से सम्बन्धित ही यात्रा उपकरण का कार्य करता था । उनके लिये ऐसा करना भी आवश्यक था । - हाँ बगल वाले मकान की जो लङकी पढ़ाई कर रही थी । वह मेरे लिये आश्चर्य था । शायद स्थायी जिन्नता में ऐसा कुछ होता हो । क्योंकि जीवन के ढर्रे में सभी जगह प्रथ्वी से बहुत चीजें मिलती हैं । उस मकान की जिन्न स्त्रियां भी साधारण ग्रहणियों की भांति थी । और बगल वाले घर में क्या हो रहा है । इसके प्रति लगभग उदासीन थी । शायद ऐसा होना उनके जीवन का हिस्सा रहा हो ।  - अब तक शुद्ध रूप से जिन्न प्रेत सम्बन्धित ये मेरा लगभग दसवां लोक था । जिसमें कारणों से मेरी यात्रा हुयी थी ।  ----------- जानकारी के तौर पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है । पर अभी इतना ही । at 9:56 pm साझा करें 11 जुलाई 2016 हंसदीक्षा विवरण परिचय - आदिसृष्टि से ही जब परमात्मा द्वारा ब्रह्म, जीव और माया का खेल रचा गया । तो अविद्या रूपी प्रबल माया के साथ साथ ज्ञान स्थिति और सदगुरु जैसी विभूति का सृजन भी किया गया । ताकि सभी जीव अपने सतकर्म, परमार्थ और भावभक्ति से अपना उत्थान कर सकें । उच्च स्थितियों को प्राप्त हो सकें । जीव से ब्रह्म तक की यात्रा और स्व प्रतिष्ठा कर सकें । अतः अविद्या रूपी प्रबल माया से मोहित हुआ निज स्वरूप, निज पहचान, निज घर को भूला हुआ जीव जब इस अपार भवसागर के दुखों में डूबता उतराता है और इस अन्तहीन भवसागर का कोई ओर छोर नही पाता है । तब वह इस कष्ट से छूटने हेतु बेहद करुणाभाव से अपने स्वामी को पुकारता है । और फ़िर कुल मालिक की दया दृष्टि होने पर पहले सन्तों की कृपा प्राप्त कर उनकी सेवा, सतसंग करता है । और बाद में कृमशः गुरु-सदगुरु का सानिंध्य पाकर इस अमर ज्ञान ‘हंसदीक्षा’ का पात्र बनता है । सदगुरु - किसी भी एक समय में देहधारी वर्तमान सदगुरु एक ही होता है । दो-चार या कई नही होते । जिस शरीर में सदगुरु सत्ता का प्राकटय हुआ हो । उसे ही ‘समय का सदगुरु’ कहते हैं । सदगुरु का अर्थ उसका परमात्मा से एक हो चुका होना या उसके अन्दर परमात्मा का प्रकट होना होता है । सब घट तेरा सांईया, सेज न सूनी कोय । बलिहारी उन घटन की, जिहि घट परगट होय । लाभ - हंसदीक्षा का सबसे बङा लाभ यह है कि एक बार सच्ची दीक्षा मिल जाने पर यदि शिष्य/भक्त साधारण भक्ति भी कर पाता है तो फ़िर उसका तिर्यक योनि यानी पशु पक्षी आदि 84 लाख योनियों में जन्म न होकर सदैव मनुष्य जन्म होता है । अच्छे कुल और अच्छे संस्कारी परिवार में अपनी भक्ति और सेवा अनुसार ही उद्धार होने तक जन्म पाता है । ज्ञान बीज बिनसै नही, होवें जन्म अनन्त । ऊँच नीच घर ऊपजे, होय सन्त का सन्त । तुलसी अपने राम को, रीझ भजो या खीज । खेत परे को जामिगो, उल्टो सीधो बीज । सच्चे सदगुरु से हंसदीक्षा प्राप्त जीव (यदि बहुत ज्यादा विकारी और मनमुख या गुरुद्रोही न हो तो) कभी नर्क नही जाता । सोना काई ना लगे, लोहा घुन ना खाय । भला बुरा जो गुरु भगत, कबहुं न नरकै जाय । वर्तमान में - गुरु शिष्य परम्परा का धर्म की दृष्टि से नकली पाखंड जारी है । हैरानी की बात है कि तमाम अज्ञानी व्यक्ति किसी भी ज्ञान को आत्मज्ञान या परमात्म ज्ञान कहकर प्रचारित कर रहे हैं । जबकि वास्तव में विशुद्ध आध्यात्मिक स्तर पर बात की जाये तो ये तन्त्र मन्त्र जैसे तुच्छ ज्ञान की श्रेणी में भी नहीं आता । एक धार्मिक टीवी चैनल पर किसी गुरु को यह भी कहते सुना गया कि सभी जगह एक ही दीक्षा दी जा रही है ? आजकल ऐसे भी गुरु हैं । जो कहते हैं - तुम कोई भी नाम मन्त्र जपो । सभी परमात्मा से ही मिलाते हैं । निश्चय ही इसे भारतीय सनातन धर्म के अज्ञान की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा । कान में कर दी कुर्र । तुम चेला हम गुर्र ।  लोभी गुरु लालची चेला । होय नरक में ठेलम ठेला । सच्ची और दुर्लभ आत्मज्ञान की हँसदीक्षा - किसी भी इंसान के जो अभी सशरीर है । आदिसृष्टि से अब तक करोङों मनुष्य जन्म हो चुके हैं । इसमें (सामान्य नियम में) एक मनुष्य जन्म से दूसरे मनुष्य जन्म के बीच में भोगी जाने वाली साढ़े 12 लाख साल समय अवधि की 84 लाख योनियां अलग से होती हैं । बङे भाग मानुष तन पावा । सुर दुर्लभ सद ग्रन्थन गावा । कबहुंक करुना करि नर देही । देत हेत बिन परम सनेही । इस तरह लगभग असंख्य (कोटि) जन्मों में जीव जब अशान्ति, कष्ट, दुखों और अज्ञान से त्राहि त्राहि कर करुण भाव से परमात्मा को पुकारता है । और विभिन्न जन्मों में किये गये परमार्थिक पुण्य कार्यों से वह इतना भक्ति पदार्थ संचय कर लेता है कि उसका आगामी कोई जन्म उद्धार जन्म (जीवन) के रूप में होता है । तब उसे किसी सच्चे सन्त की शरण हासिल होती है और फ़िर कृमशः ही वह किसी माध्यम से उस सच्चे दरबार में महीनों पहले अर्जी लगाकर फ़िर वहाँ से मंजूर होने पर ही इस अति दुर्लभ हँसदीक्षा को प्राप्त कर पाता है । निर्वाणी नाम या धुन - सच्ची हँसदीक्षा में कोई अक्षरी मन्त्र या नाम आदि कभी नहीं दिया जाता । यहाँ तक वाणी से ‘क’ जैसा अक्षर भी नहीं जपना होता । बल्कि प्रत्येक मनुष्य की आवागमन करती स्वांस में जो निर्वाणी नाम (पहली अवस्था) स्वतः अजपा और निरन्तर हो रहा है को जाग्रत किया जाता है । और बाद में इसी पर अधिकाधिक ध्यान रखने का अभ्यास बताया जाता है । जिसे भजन, सुमरन, ध्यान, नाम जप या नाम कमाई भी कहा जाता है । हँसदीक्षा को भी अलग अलग नामों से गुरुदीक्षा, नामदान, नाम उपदेश या (गुरु से) ज्ञान लेना आदि कहा जाता है । निरंजन तेरे घट में, माला फ़िरे दिन रात । ऊपर आवै नीचे जावै, स्वांस स्वांस चढ़ि जात । संसारी नर जानत नाहीं, विरथा जन्म गंवात । ------------- माला फ़ेरत जुग भया, फ़िरा न मन का फ़ेर । कर का मनका डार दे, मन का मनका फ़ेर । सीधे आज्ञाचक्र से उठाना - सच्ची हँसदीक्षा में (आज्ञाचक्र से नीचे के सभी चक्रों को छोङकर) सीधा आज्ञाचक्र सक्रिय कर दिया जाता है । ताकि भक्त साधक नीचे के चक्रों के कष्ट और मेहनत से बचकर सरल सहज योग भक्ति कर सके । जिसे सन्तमत में ‘सुरति शब्द योग’ या ‘सहज योग’ कहा जाता है । जङ चेतन की गांठ खुलना - हँसदीक्षा में ही समर्थ सदगुरु जीव के उद्धार और सार, थोथा.. नीर, क्षीर बोध हेतु जङ चेतन की गांठ खोल देते हैं । और तीसरा नेत्र खुलकर दिव्य प्रकाश के दर्शन हो जाते हैं । कोई कोई सात्विक वृति के साधक और पवित्र भाव की जीवात्मायें सिर्फ़ हँसदीक्षा के दौरान ही एक या दो अलौकिक लोक तक की सूक्ष्म यात्रायें करती हैं । जिनमें अधिकांश को स्वर्गलोक के दर्शन होने का अनुभव अधिक प्रकाश में आया है । कुछ कुत्सित और तमोगुण मिश्रित साधकों को निम्न लोक या तांत्रिक लोक आदि जैसे नीच लोकों के दर्शन भी होते हैं । इस तरह ये सफ़ल पूर्ण हँसदीक्षा के प्रारंभिक अनुभव कहे जा सकते हैं । विशेष - अपवाद स्वरूप जो शिष्य दीक्षा के समय हङबङा जाते हैं । या खुद को चौकन्ना सा होकर ‘अलर्ट’ रखते हैं । उनको मामूली अनुभव होना या बिलकुल न होना भी अनुभव में आया है । अतः दीक्षा के इच्छुक सभी शिष्यों को सुझाव है कि सरलता और भक्तिभाव से दीक्षा पूर्व के उपदेशों को ग्रहण करें । जिज्ञासाओं और शंकाओं का पहले ही गुरु से सहज निवारण कर लें । और खास दीक्षा के समय शरीर और मन को बिलकुल ढीला और आरामदायक (तनावरहित) अवस्था में छोङ दें । दीक्षा का समय - हँसदीक्षा का समय सुबह लगभग 8-10 बजे तक का ही होता है । उससे पूर्व की संध्या और रात्रि में सदगुरु गुप्त आदिनाम की महिमा जानकारी आदि विषयों पर गूढ़ सतसंग आये हुये शिष्यों को उनकी जिज्ञासाओं के समाधान के साथ बताते हैं । इसके बाद अगली सुबह बृह्ममुहूर्त में स्नान आदि से फ़ारिग होकर हँसदीक्षा दी जाती है । दीक्षा की सामग्री - हँसदीक्षा में इस मरणधर्मा शरीर के पाँच तत्वों के प्रतीक पाँच रंग के पाँच पाँच फ़ूल और धूपबत्ती या अगरबत्ती का नया पैकेट और सफ़ेद रंग (बर्फ़ी, पेङा, बतासे, रेवङियां आदि जो ठीक लगे) का प्रसाद श्रद्धा और सामर्थ्य अनुसार रखा जाता है । ये सब दीक्षा के समय ही एक पूजा की थाली में रख दिया जाता है । गुरुदक्षिणा - इस हँसदीक्षा में शिष्य का जीव से नया आत्मजन्म होता है । अतः काल के प्रकोप से बचने हेतु गुरु की शरण में जाकर ‘तन मन धन’ यानी पूर्ण समर्पण किया जाता है । इसी हेतु गुरुदीक्षा में गुरुदक्षिणा में धन देने का एक निश्चित आदिविधान है । जो शिष्य की श्रद्धा, सामर्थ्य अनुसार ही स्वयं उसके भाव से अर्पित किया जाता है ।  हँसदीक्षा की आवश्यक वस्तुयें - गुरु के पाँच वस्त्र (यदि भाव और आर्थिक सामर्थ्य हो तो अन्यथा आवश्यक नहीं) । चरण पादुका (भाव और सामर्थ्य अनुसार ही अन्यथा आवश्यक नही) पाँच (तत्वों के प्रतीक) रंग के पाँच पाँच (तत्व की प्रकृतियों अनुसार 25)  फ़ूल । नया धूपबत्ती या अगरबत्ती का पैकेट । सफ़ेद  रंग का का प्रसाद । गुरुदक्षिणा (भाव श्रद्धा और सामर्थ्य अनुसार) ---------------- हंसदीक्षा के विषय में यथासंभव आवश्यक और सार संक्षिप्त जानकारी इस लेख में बता दी गयी है । फ़िर भी किसी जिज्ञासु को कोई बात समझ न आयी हो या उनकी कोई अन्य शंका, प्रश्न आदि हो । वह टिप्पणी में लिखें । उसका पूर्णरूपेण समाधान किया जायेगा । - हंसदीक्षा के स्थान (आश्रम) और अन्य जानकारी के विषय में प्रकाशित चित्रों को देखें । ------------ मुक्तमंडल, आगरा, उत्तर प्रदेश । at 4:58 am साझा करें जिहाद - मुंशी प्रेमचन्द बहुत पुरानी बात है । हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत प्रदेश से भागा चला आ रहा था । मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ साथ रहते चले आये थे । धार्मिक द्वेष का नाम न था । पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे । उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था । बात बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे ।  शासन की कोई व्यवस्था न थी । हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी । आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था । जान का बदला जान था, खून का बदला खून । इस नियम में कोई अपवाद न था । यही उनका धर्म था, यही ईमान । मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे । पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है । एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आकर अनपढ़ धर्म शून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है । उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री पुरुष खिंचे चले आते हैं । वह शेरों की तरह गरज कर कहता है - खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनियां को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो । दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो । एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है । जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे । खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा ।  और सारी जनता यह आवाज सुनकर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है । उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है । प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है । उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे । हमले होने लगे हैं । कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं । कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं । कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है । हिंदू संख्या में कम हैं । असंगठित हैं । बिखरे हुए हैं । इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं । उनके हाथ पाँव फूले हुए हैं । कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़कर भाग खड़े हुए हैं । कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं ।  यह काफिला भी उन्हीं भागने वालों में था । दोपहर का समय था । आसमान से आग बरस रही थी । पहाड़ों से ज्वाला सी निकल रही थी । वृक्ष का कहीं नाम न था । ये लोग राजपथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे । पग पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था । यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे । सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया । वहीं डेरे डाल दिये । भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो । दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे । बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे । स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं । सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे । सभी चिंता और भय से त्रस्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे जोर से न रोते थे । दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है । उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ सी निकल रही हैं । मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता । मानो उसकी एक एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं । दूसरा कद का दुबला पतला, रूपहीन सा आदमी है । जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है । मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं । मानो वह दीपक की भाँति रो रोकर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है । उसका नाम धर्मदास है । इसका ख़ज़ाँचन्द । धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा - तुमने अपने लिए क्या सोचा ? कोई लाख, सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ? ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया - लाख, सवा लाख की तो नहीं, हाँ, पचास साठ हजार तो नकद ही थे । - तो अब क्या करोगे ? - जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा । रावलपिंडी में दो चार सम्बन्धी हैं । शायद कुछ मदद करें । तुमने क्या सोचा है ? - मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं । वहाँ इन्हीं का सहारा था । आगे भी इन्हीं का सहारा है । - आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं । - मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय । एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ । इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली । प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी । दोनों युवक उसकी ओर बढ़े । लेकिन ख़ज़ाँचंद तो दो चार कदम चल कर रुक गया । धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और ख़ज़ाँचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएँ की ओर चला । ख़ज़ाँचंद ने फिर बंदूक सँभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा । इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था । शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था । अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्र धर्मदास है । ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूप वैभव के आगे तुच्छ थी । परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार ख़ज़ाँचंद को हताश कर चुकी थी । पर वह अभागा निराश होकर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था । तीनों एक ही बस्ती के रहने वाले थे । श्यामा के माता पिता पहले ही मर चुके थे । उसकी बुआ ने उसका पालन पोषण किया था । अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी । उसकी अभिलाषा थी कि ख़ज़ाँचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अंतिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाये । लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी । उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है । वही उसका एकमात्र अवलम्ब है ।  ख़ज़ाँचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती । उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटा कर फकीर हो जाता । 2 धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये । जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं । उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं । धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें । लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था । फासला दो सौ गज से कम न था । रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे फूटे पड़े हुए थे । भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय । कहीं पैर न फिसल जायँ । इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे । अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या । उस पर मंजिलों का धावा हुआ । मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे । और तुरंत उसे घेर लिया । धर्मदास बड़ा साहसी था । पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया । उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी । पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे ।  एक पठान ने कहा - उड़ा दो सिर मरदूद का । दग़ाबाज़ काफिर । दूसरा - नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले । तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं । क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ? हमने तुम्हें रात भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था । मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ । लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं । यह आखिरी मौका है । अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया । तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी । धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा - जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे ... पहले सवार ने आवेश में आकर कहा - मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं । तीसरा - कुफ्र है ! कुफ्र है ! पहला - उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार । दूसरा - ठहरो..ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है । तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ? धर्मदास - सब मेरे साथ ही हैं । दूसरा - कलामे शरीफ़ की कसम । अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ । तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा । धर्मदास - आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे । इस पर चारों सवार चिल्ला उठे - नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे । यह आखिरी मौका है । इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला -बस बोलो, क्या मंजूर है ? धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला - अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ । तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ? दूसरा - हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे । पहला - हम इस शर्त को नहीं मानते । तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे । तुम अपनी कहो । क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ? धर्मदास ने जहर का घूँट पीकर कहा - मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ । पाँचों ने एक स्वर से कहा - अलहमद व लिल्लाह ! और बारी बारी से धर्मदास को गले लगाया । 3 श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी । वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा । तो मैं प्यासों मर जाती । पर इन्हें न जाने देती । श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था । श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा - अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती । ख़ज़ाँचंद - बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है । श्यामा - न जाने क्या बातें हो रही हैं । अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है । ख़ज़ाँ.- जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ । इतनी दूर की मार इसमें नहीं है । श्यामा - अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं । यह माजरा क्या है ? ख़ज़ाँ.- कुछ समझ में नहीं आता । श्यामा - कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ? ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है । श्यामा - मैं समझ गयी । ठीक यही बात है । बंदूक चलाओ । ख़ज़ाँ.- धर्मदास बीच में हैं । कहीं उन्हें न लग जाय । श्यामा - कोई हर्ज नहीं । मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े । कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया । ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है । क्या सोचते हो । क्या तुम्हारे भी हाथ पाँव फूल गये । लाओ, बंदूक मुझे दे दो । मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी । ख़ज़ाँ.- मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास ... श्यामा - तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा । लाओ, बंदूक मुझे दो । खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओगे ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान होकर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ । श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है । मगर उसे अब मुँह न दिखाना । ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी । एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी । जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर’ की हाँक लगायी । दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी । घोड़ा वहीं गिर पड़ा । जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर’ की सदा लगायी और आगे बढ़े । तीसरी गोली आयी । एक पठान लोट गया । पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये । और बंदूक उसके हाथ से छीन ली । एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा - उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है । दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा - नहीं नहीं, यह दिलेर आदमी है । ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है । लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं । अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ । तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं । इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा ( प्रायश्चित्त ) नहीं है । यह हमारा आखिरी फैसला है । बोलो, क्या मंजूर है ? चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं । और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी । ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा । उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं । दृढ़ता से बोला - तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ।  चारों पठानों ने कहा - काफिर ! काफिर । ख़ज़ाँ.- अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो । मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ । मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है । आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर ( प्रकाश ) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल ... चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं ।  लाश जमीन पर फड़कने लगी । धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा । वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी । और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा । पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था । श्यामा अब तक मर्माहत सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी । ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी । वह झपट कर लाश के पास आयी । और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी । उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये । उसने बड़ी सुंदर बेलबूटों वाली साड़ियाँ पहनी होंगी । पर इस रक्तरंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी । बेलबूटों वाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं । यह रक्तरंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी । ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं । उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी । जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी । वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था । 4 धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा - श्यामा, होश में आओ । तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं । अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं । हमें कोई कष्ट न देंगे । हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ? श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा - तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ । मेरी चिंता मत करो । मैं अब न जाऊँगी । हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो । तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो । धर्मदास करुणा कातर स्वर से बोला - श्यामा, यह तुम क्या कहती हो । तुम भूल गयीं कि हमसे तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है । पर भावी को कौन टाल सकता है ? श्यामा - अगर यह भावी थी । तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ । जिसका मैंने सदैव निरादर किया । यह कहते कहते श्यामा का शोकोदगार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था । उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी । चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म समर्पण देखकर करुणार्द्र हो गये । सरदार ने धर्मदास से कहा - तुम इस पाकीजा खातून से कहो । हमारे साथ चले । हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी । हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे । धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी । वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था । इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी ।  बोला - श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो । पर यह जिंदा न होगी । यहाँ से चलने की तैयारी करो । मैं साथ के और लोगों को भी जाकर समझाता हूँ । खान लोग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं । हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी । ख़ज़ाँचंद की दौलत के भी हमीं मालिक होंगे । अब देर न करो । रोने धोने से अब कुछ हासिल नहीं । श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा - और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ? धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका । बोला - मैंने तो कोई कीमत नहीं दी । मेरे पास था ही क्या ? श्यामा - ऐसा न कहो । तुम्हारे पास वह खजाना था । जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था । जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंद सिंह ने की थी । उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया । इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो ! तुम शौक से जाओ । जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया । उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया । जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया । इसके साथ जो उदासीनता दिखायी । उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी । यह धर्म पर मरने वाला वीर था । धर्म को बेचने वाला कायर नहीं । अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है । तो इसका क्रियाकर्म करने में मेरी मदद करो । और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो । तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी । पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे । धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया । देखते देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया । धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे । चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी । उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा । ज्वाला प्रचंड हुई । अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे । पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति लाकर श्यामा को दे दी । श्यामा ने वहीं पर एक छोटा सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी । उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये । क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी । ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया । मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया । एक दिन नियत किया गया । मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये । पर उसका वहाँ पता न था । चारों तरफ तलाश हुई । कहीं निशान न मिला । साल भर गुजर गया । संध्या का समय था । श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी । अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था । वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था । सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं । और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था । आकाश पर लालिमा छायी हुई थी । सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी । वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी । मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो । उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया । कुत्ता जोर से भूँक उठा । श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी - धर्मदास ! धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा - हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ । साल भर से मारा मारा फिर रहा हूँ । मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है । सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है । इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ । पर मौत भी नहीं आती । धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया । फिर बोला - क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ । तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया । श्यामा ने उदासीन भाव से कहा - मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी । - मैं अब भी हिंदू हूँ । मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है । - जानती हूँ । - यह जानकर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती । श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली - तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती । मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू जाति का मुख उज्ज्वल किया है । तुम समझते हो कि वह मर गया ? यह तुम्हारा भ्रम है । वह अमर है । मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ । तुमने हिंदू जाति को कलंकित किया है । मेरे सामने से दूर हो जाओ । धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया । चुपके से उठा । एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया । प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी । दो चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे । उसका हृदय धड़कने लगा । समीप जाकर देखा और पहचान गयी । यह धर्मदास की लाश थी ।  at 4:58 am साझा करें 05 जुलाई 2016 एक अश्लील पोस्ट आपने कभी गौर किया है, क्या देश क्या विदेश क्या शहर क्या गांव क्या मुहल्ले, सभी जगह मुख्य गाली के रूप में माँ, बहन और पुत्री को ही हमेशा लक्ष्य किया जाता है । अलग अलग स्थानीय भाषाओं के अनुसार माँ, बहन और पुत्री इन तीन शब्दों को स्थानीय लहजे में बदल कर इनके साथ सहवास क्रिया का प्रचलित सस्ता शब्द रोमन के अनुसार Cho और den जोङ दिया जाता है । इस तरह एक सर्वदेशीय सर्वाधिक प्रचलित अपशब्द या अपमानजनक शब्द बन जाता है । अब गौर करने वाला दूसरा बिन्दु यह है कि सिर्फ़ घृणा या बदला या अपमान के उद्देश्य से ही नहीं बल्कि दोस्तों या मजाक के रिश्तों या फ़िर सामान्य सम्बन्धों में भी सामान्य बातचीत या हास्य या फ़िर दोस्ताना बातचीत में भी माँ, बहन और पुत्री सम्बन्ध के साथ यौन क्रिया शब्द जोङ दिया जाता है । ग्रामीण क्षेत्रों और ग्रामीण जनता में तो यह आम है और मैंने बच्चे से लेकर वृद्धों तक को किसी के भी सामने ऐसा बोलते सुना है । यहाँ तक कि महिलाओं या लङकियों की उपस्थिति में भी । क्योंकि यह ग्रामीण संस्कृति में रचा बसा है । अब एक और बात पर गौर करें । पत्नी जो कि एक अर्थ में काम का पर्याय है । उसके लिये ऐसा कभी नहीं कहा जाता । अन्य दूसरे रिश्ते मामी भाभी बुआ ताई चाची मौसी आदि भी अपवाद स्थिति या 1% छोङकर कभी इस गाली या मजाक के लक्ष्य नहीं होते । यदि किसी व्यक्ति का सामने वाले से कोई ऐसा मजाक सम्बन्ध ही है । तब अलग बात है । मान लो, एक व्यक्ति की मौसी सामने वाले व्यक्ति की साली, सलहज आदि जैसा कुछ लगती है तो कभी कभी बेहद न्यून प्रतिशत में उस रिश्ते के साथ यौन क्रिया शब्द जोङते हैं । अब बात यह है कि इसकी जङ कहाँ हैं ? पत्नी या प्रेमिका जो काम सम्बन्धों का स्वीकार्य अस्तित्व है । गाली में उससे ऐसी बाहय रूप काम भावना क्यों नहीं प्रेषित होती । सिर्फ़ ये माँ, बहन और पुत्री..ये तीन सम्बन्ध ही क्यों । इसके पीछे की वास्तविकता आपको हिला सकती है । जिसका मूल आदि में है ? दरअसल पत्नी जैसा कोई अस्तित्व सृष्टि में है ही नहीं । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं । पति या पत्नी सिर्फ़ एक ऐसे (बहुत गहराई से गौर करें) शरीर का अस्तित्व है । जिनका अन्य अर्थों के साथ साथ काम क्रिया जैसा सम्बन्ध भी है । और समझें, पत्नी सिर्फ़ रूपान्तरण है । उससे पूर्व वह माँ, बहन, पुत्री ही है और गहराई में जायें तो ये तीन सम्बन्ध आने वाले जन्मों में कभी भी पत्नी में रूपान्तरित होते है और अभी की पत्नी भी अगले जन्मों में इन तीन सम्बन्धों में रूपान्तरित होती है । यह निश्चय और अचेतन कार्मिक वासनाओं से बना सिद्धांत है । जो होता ही होता है । राजा भोज और उनकी साली का इस सम्बन्ध में विवरण है । अन्य दृष्टांत भी मिलते हैं । इस पोस्ट को आपके गहन विचारार्थ अधूरा और अस्पष्ट छोङते हुये मैं आदि कारण बताता हूँ । जिसमें सृष्टा ने पत्नी बनायी ही नहीं थी और कभी नहीं बनाई । मूल सृष्टा पुरुष का निर्माण कर चुका था । उसने अभी स्त्री नहीं बनाई थी । फ़िर उसने पहली स्त्री बनाई और पहले मन पुरुष के पास कार्यवश भेजी । मन पुरुष उस पर मोहित हो गया लेकिन स्त्री ने एक ही सृष्टा होने से बहन होने का हवाला दिया । परन्तु कुछ विरोध तकरार के बाद वह भी कामासक्त हो उठी और सृष्टि का प्रथम स्त्री पुरुष सम्बन्ध हुआ । सोचिये ये किसके मध्य था ? फ़िर इस सम्बन्ध से तीन पुत्र हुये और वो कर्म उदासीन से विरक्त रहने लगे । तब प्रथम स्त्री ने अपने अंश से तीन कन्यायें उत्पन्न कर उनको एक जगह छुपा दिया और पुत्रों को उस स्थान पर भेजा । तीनों ने (क्योंकि वह तो जानते नहीं थे) उन्हें खुशी खुशी पत्नी स्वीकार किया । उनके परस्पर सम्बन्ध हुये । सोचिये माँ का अंशी (याने समान) कौन हुआ ? अब मूल सृष्टा ने जिन पुरुषों को पूर्व में उत्पन्न किया । वे भी समान ही माने जायेंगे और उसने इच्छा रूपी स्त्री उत्पन्न हुयी तो यह एक भाव में पुत्री हुयी । अर्थात एक भाव में प्रथम सहवास पिता पुत्री का भी कहा जा सकता है । तो पूर्व के दो स्त्री सम्बन्ध खास थे - माँ और बहन । आगे पुत्री हुयी । और थोङे आवरणों के साथ इन्हीं को पत्नी स्वीकार कर लिया गया । ऊपर गाली के तीन सम्बन्ध बेहद आध्यात्मिक अर्थ वाले हैं । जो मूल की याद दिलाते हैं या जिनमें मूल का बीज छिपा है । क्योंकि वैसे तो परमात्मा न स्त्री है न पुरुष है और दोनों में वह 1 ही है । --------- अब संक्षेप में समझें, पत्नी सिर्फ़ एक भाव है या इसका पुरुष भाव पति भी । जो काम क्रियाओं के समूह रूप को बनाता है । एक स्त्री पुरुष शरीर में परस्पर आधे आधे स्त्री पुरुष होते हैं । यदि ऐसा न हो तो स्त्री पुरुष के बीच काम सम्बन्ध असंभव है । काम सम्बन्ध के समय स्त्री की आधी स्त्री पुरुष की आधी स्त्री से और पुरुष का आधा पुरुष स्त्री के आधे पुरुष से मेल करता है  और तब स्त्री पुरुष का मिलन होता है । ये मोटी बात नही है । बारबार चिन्तन करते हुये गहराई से समझ में आयेगी । ----------- अश्लील पोस्ट लिखी ही है तो पुरुषों के पुरुषांग के लिये सबसे चीप शब्द ला ना और डा जैसे संयोग से बना बोलते समय क्या पदार्थ और धातु का अहसास होता है ? यहाँ सामान्य स्थिति की बात है न कि कामभावना के समय या किन्हीं उत्तेजक वार्ता के समय । स्वयं इसका अनुभव करें और समझदार विवेकी मित्रादि अन्य अन्य से तुलनात्मक सामान्य स्थिति में इसकी प्रकृति को जानें । ध्यान रहे ये कोई मजाक मनोरंजन नहीं है । प्रकृति रहस्य से इसका गहरा नाता है । खुद अनुभव करें । स्त्री यौनांग के लिये प्रचलित सबसे चीप शब्द चा ऊ और ता को बोलते समय एक पुरुष को सामान्य स्थिति में कुछ महसूस नहीं होगा । अब यहाँ ध्यान रखें । इसको पढकर ही आप यकायक यह शब्द बोलें । कुछ अहसास नहीं होगा लेकिन जब आप सहज स्वाभाविक सामान्य स्थिति में हों तो एक सृष्टिक पदार्थ और धातुगत अनुभूति होगी । जो ठोस और मजबूती की होगी और जिसका सम्बन्ध कामभावना से न होकर स्वयं के वीर्य बल का मापन बतायेगा । बशर्ते आप बात को ठीक से समझ कर प्रयोग अनूभूति कर सके तो ? at 10:10 pm साझा करें रमता के संग समता दरअसल मेरा एक शोध अन्य बिन्दु पर अटका है जो आपकी इस लाइन से झंकृत हुआ - पूरे वृत्त में 21600 कला और एक वृत्त में 360 अंश । ------- अब दो बाते हैं - 24 घन्टे में 360 अंश वाली प्रथ्वी भी 1 चक्र (वृत) पूरा करती है  और जीवन के 1 चक्कर (24 घन्टे) में 21600 स्वांस ही होती है । अब जो आपने 60 कला = मिनट बताया (वैसे घङी, पल, काष्ठा, निमेष आदि का मान मेरे पास है) यानी सेकेण्ड की सुई 60 बार ठिठक गति द्वारा 1 चक्र पूरा करे । तो 60 कला या 1 मिनट हुआ । मेरा शोध शरीर की मिनट सेकेण्ड की सुई को प्रथ्वी या अन्य पिंडों से क्या तारतम्य ये जोङना है । क्योंकि ये 4 कला (स्वांस) वृत रूपी बुलबुले एक पूर्ण वृत का सृजन विघटन निरन्तर करते हैं ।  अधिक विस्तार से नहीं लिखा । क्योंकि आप मूल बात समझ जायेंगे । ---------- मेरी इस टिप्पणी पर सुनील सिंहा की प्रतिक्रिया -  सर, आपने जो शोध की बात की है पृथ्वी के पिण्ड और शरीर के समय चक्र के बीच, वह मैं विस्तार से आपसे जानने और समझने की विनती है । सुनील सिंहा ----------- और उसका यथासंभव उत्तर - जी, यदि इस विषय के बारे में थोङी बहुत मौलिक जानकारी न हो । वहाँ इसका बेहद विस्तार से समझाना अपेक्षित हो जाता है । जो लेखन के रूप में कुछ असंभव सा है । क्योंकि ना जानकार के  लिये ज्यादातर बिन्दुओं पर नये प्रश्न उत्पन्न हो जाते हैं । फ़िर भी सार संक्षेप में बात यह है कि - निराधार अखिल सृष्टि (पंचभूत और समस्त तारा पिंड, जीव जन्तु आदि) एक ‘सार शब्द’ की सत्ता से संचालित हैं । इस शब्द से अखण्ड (भीषण) कंपन हो रहा है । इस कंपन से अकल्पनीय माप वाला गुरुत्व, चुम्बकत्व (उत्पन्न होता है) तथा एक चुम्बकीय तरंगो का जाल भी बना हुआ है । इसी तरंग जाल द्वारा समस्त चल अचल देहधारी जीव और तारा पिंडों जैसे अन्य पद परस्पर एक सूत्र में बंधे हुये हैं । यानी किसी एक की छोटी सी गतिविधि भी समस्त (सृष्टि) को प्रभावित करती है । अब बात यह है कि ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ के आधार पर यह अखिल सृष्टि (मूल) ब्रह्मांडी मन द्वारा संचालित है । जो सदैव अविकारी और एक नियम है और शुद्ध पिंडी (जीव आदि) मन (यदि हो) भी इसी अविकारी और एक नियम पर कार्य करता है । सरलता से कहें तो ‘रमता के साथ समता’ होती है । तब वह सृष्टि, प्रकृति आदि हलचल का ज्ञाता होता है । रहस्य जानता है । साक्षी होता है आदि । लेकिन जीव का मन या अन्य गतिविधियां जब ब्रह्मांडी मन से विषम या अस्थिर हो उठती हैं । तब तरह तरह के विकार, रोग, अज्ञान, जङता आदि शारीरिक मानसिक बाधायें व्याधियां उत्पन्न होने लगती हैं । उनमें क्षोभ उत्पन्न हो जाता है । अगर इसी अनहद शब्द के साथ जोङने वाला समर्थ गुरु हो । तो ये ‘रमता के साथ समता’ स्वतः हो जाती है । क्योंकि तब जीव मन अपनी मनमानी के बजाय ब्रह्मांडी मन से नियन्त्रित होता है । 2 सेकेण्ड की सांस का एक वृत ( या अणु ), मध्य में रिक्तता, पुनः 2 सेकेण्ड की सांस का एक वृत..ये स(रिक्त)ह और ह(रिक्त)स ऐसे अणु परमाणु बनाते हैं । ये सामान्य मनुष्य के होते हैं । बाकी योगी आदि आगे या पीछे स्थिति अनुसार ह(रिक्त)ठ या ठ के स्थान पर अन्य बीज भी हो सकता है, होते हैं । ---------------- मूलतः समाधि एक ही होती है । उसकी ही अलग अलग स्थितियों के भिन्न भिन्न नाम हैं । गहराता हुआ ध्यान समाधि ही है । जो कृमशः विकार, संस्कार, कारण और फ़िर कारण बीज समाप्त करके जीव का जीव भाव समाप्त कर देता है । और परमात्मा प्रकट हो जाता है । at 8:19 pm साझा करें ‹ › मुख्यपृष्ठ वेब वर्शन देखें Blogger द्वारा संचालित.

यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते 

यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते | येन मार्गेण मुनयः सर्वज्ञत्वं प्रपेदिरे || यत्प्राप्य न पुनर्याति नरः संसारबन्धनम् | तथाविधं परं तत्वं वक्तव्यमधुना त्वया ||   जिसको सुनने मात्र से मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाता है | जिस उपाय से मुनियों ने सर्वज्ञता प्राप्त की है, जिसको प्राप्त करके मनुष्य फ़िर से संसार बन्धन में बँधता नहीं है ऐसे परम तत्व का कथन आप करें | (3, 4)   गुह्यादगुह्यतमं सारं गुरुगीता विशेषतः | त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्या तत्सर्वं ब्रूहि सूत नः ||   जो तत्व परम रहस्यमय एवं श्रेष्ठ सारभूत है और विशेष कर जो गुरुगीता है वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं | प्यारे सूतजी ! वे सब हमें सुनाइये | (5)   इति संप्राथितः सूतो मुनिसंघैर्मुहुर्मुहुः | कुतूहलेन महता प्रोवाच मधुरं वचः ||   इस प्रकार बार-बार प्रर्थना किये जाने पर सूतजी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले | (6)   सूत उवाच श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे श्रद्धया परया मुदा | वदामि भवरोगघ्नीं गीता मातृस्वरूपिणीम् ||   सूतजी ने कहा : हे सर्व मुनियों ! संसाररूपी रोग का नाश करनेवाली, मातृस्वरूपिणी (माता के समान ध्यान रखने वाली) गुरुगीता कहता हूँ | उसको आप अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये | (7)   पुरा कैलासशिखरे सिद्धगन्धर्वसेविते| तत्र कल्पलतापुष्पमन्दिरेऽत्यन्तसुन्दरे || व्याघ्राजिने समासिनं शुकादिमुनिवन्दितम् | बोधयन्तं परं तत्वं मध्येमुनिगणंक्वचित् || प्रणम्रवदना शश्वन्नमस्कुर्वन्तमादरात् | दृष्ट्वा विस्मयमापन्ना पार्वती परिपृच्छति ||   प्राचीन काल में सिद्धों और गन्धर्वों के आवास रूप कैलास पर्वत के शिखर पर कल्पवृक्ष के फूलों से बने हुए अत्यंत सुन्दर मंदिर में, मुनियों के बीच व्याघ्रचर्म पर बैठे हुए, शुक आदि मुनियों द्वारा वन्दन किये जानेवाले और परम तत्व का बोध देते हुए भगवान शंकर को बार-बार नमस्कार करते देखकर, अतिशय नम्र मुखवाली पार्वति ने आश्चर्यचकित होकर पूछा |   पार्वत्युवाच ॐ नमो देव देवेश परात्पर जगदगुरो | त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा ||   पार्वती ने कहा: हे ॐकार के अर्थस्वरूप, देवों के देव, श्रेष्ठों के श्रेष्ठ, हे जगदगुरो! आपको प्रणाम हो | देव दानव और मानव सब आपको सदा भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं | (11)   विधिविष्णुमहेन्द्राद्यैर्वन्द्यः खलु सदा भवान् | नमस्करोषि कस्मै त्वं नमस्काराश्रयः किलः ||   आप ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि के नमस्कार के योग्य हैं | ऐसे नमस्कार के आश्रयरूप होने पर भी आप किसको नमस्कार करते हैं | (12)   भगवन् सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतनायकम् | ब्रूहि मे कृपया शम्भो गुरुमाहात्म्यमुत्तमम् ||   हे भगवान् ! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता ! हे शम्भो ! जो व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है ऐसा उत्तम गुरु-माहात्म्य कृपा करके मुझे कहें | (13)   इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवो महेश्वरः | आनंदभरितः स्वान्ते पार्वतीमिदमब्रवीत् ||   इस प्रकार (पार्वती देवी द्वारा) बार-बार प्रार्थना किये जाने पर महादेव ने अंतर से खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा | (14)   महादेव उवाच न वक्तव्यमिदं देवि रहस्यातिरहस्यकम् | न कस्यापि पुरा प्रोक्तं त्वद्भक्त्यर्थं वदामि तत् ||   श्री महादेव जी ने कहा: हे देवी ! यह तत्व रहस्यों का भी रहस्य है इसलिए कहना उचित नहीं | पहले किसी से भी नहीं कहा | फिर भी तुम्हारी भक्ति देखकर वह रहस्य कहता हूँ |   मम् रूपासि देवि त्वमतस्तत्कथयामि ते | लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ||   हे देवी ! तुम मेरा ही स्वरूप हो इसलिए (यह रहस्य) तुमको कहता हूँ | तुम्हारा यह प्रश्न लोक का कल्याणकारक है | ऐसा प्रश्न पहले कभी किसीने नहीं किया |   यस्य देवे परा भक्ति, यथा देवे तथा गुरौ | त्स्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ||   जिसको ईश्वर में उत्तम भक्ति होती है, जैसी ईश्वर में वैसी ही भक्ति जिसको गुरु में होती है ऐसे महात्माओं को ही यहाँ कही हुई बात समझ में आयेगी |   यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः | विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ||   जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं | दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नीगमन करनेवाले के समान पापी है |   वेद्शास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च | मंत्रयंत्रविद्यादिनिमोहनोच्चाटनादिकम् || शैवशाक्तागमादिनि ह्यन्ये च बहवो मताः | अपभ्रंशाः समस्तानां जीवानां भ्रांतचेतसाम् || जपस्तपोव्रतं तीर्थं यज्ञो दानं तथैव च | गुरु तत्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत् प्रिये ||   हे प्रिये ! वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि मंत्र, यंत्र, मोहन, उच्चाट्न आदि विद्या शैव, शाक्त आगम और अन्य सर्व मत मतान्तर, ये सब बातें गुरुतत्व को जाने बिना भ्रान्त चित्तवाले जीवों को पथभ्रष्ट करनेवाली हैं और जप, तप व्रत तीर्थ, यज्ञ, दान, ये सब व्यर्थ हो जाते हैं | (19, 20, 21)   गुरुबुध्यात्मनो नान्यत् सत्यं सत्यं वरानने | तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः ||   हे सुमुखी ! आत्मा में गुरु बुद्धि के सिवा अन्य कुछ भी सत्य नहीं है सत्य नहीं है | इसलिये इस आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये बुद्धिमानों को प्रयत्न करना चाहिये | (22)   गूढाविद्या जगन्माया देहशचाज्ञानसम्भवः | विज्ञानं यत्प्रसादेन गुरुशब्देन कथयते ||   जगत गूढ़ अविद्यात्मक मायारूप है और शरीर अज्ञान से उत्पन्न हुआ है | इनका विश्लेषणात्मक ज्ञान जिनकी कृपा से होता है उस ज्ञान को गुरु कहते हैं |   देही ब्रह्म भवेद्यस्मात् त्वत्कृपार्थंवदामि तत् | सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात् ||   जिस गुरुदेव के पादसेवन से मनुष्य सर्व पापों से विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मरूप हो जाता है वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ | (24)   शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसः | गुरोः पादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम् ||   श्री गुरुदेव का चरणामृत पापरूपी कीचड़ का सम्यक् शोषक है, ज्ञानतेज का सम्यक् उद्यीपक है और संसारसागर का सम्यक तारक है | (25)   अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम् | ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ||   अज्ञान की जड़ को उखाड़नेवाले, अनेक जन्मों के कर्मों को निवारनेवाले, ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करनेवाले श्रीगुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिये | (26)   स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनम् भवेदनन्तस्यशिवस्य कीर्तनम् | स्वदेशिकस्यैव च नामचिन्तनम् भवेदनन्तस्यशिवस्य नामचिन्तनम् ||   अपने गुरुदेव के नाम का कीर्तन अनंत स्वरूप भगवान शिव का ही कीर्तन है | अपने गुरुदेव के नाम का चिंतन अनंत स्वरूप भगवान शिव का ही चिंतन है | (27)   काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम् | गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारकं ब्रह्मनिश्चयः ||   गुरुदेव का निवासस्थान काशी क्षेत्र है | श्री गुरुदेव का पादोदक गंगाजी है | गुरुदेव भगवान विश्वनाथ और निश्चय ही साक्षात् तारक ब्रह्म हैं | (28)   गुरुसेवा गया प्रोक्ता देहः स्यादक्षयो वटः | तत्पादं विष्णुपादं स्यात् तत्रदत्तमनस्ततम् ||   गुरुदेव की सेवा ही तीर्थराज गया है | गुरुदेव का शरीर अक्षय वटवृक्ष है | गुरुदेव के श्रीचरण भगवान विष्णु के श्रीचरण हैं | वहाँ लगाया हुआ मन तदाकार हो जाता है | (29)   गुरुवक्त्रे स्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः | गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् पुरूषं स्वैरिणी यथा ||   ब्रह्म श्रीगुरुदेव के मुखारविन्द (वचनामृत) में स्थित है | वह ब्रह्म उनकी कृपा से प्राप्त हो जाता है | इसलिये जिस प्रकार स्वेच्छाचारी स्त्री अपने प्रेमी पुरुष का सदा चिंतन करती है उसी प्रकार सदा गुरुदेव का ध्यान करना चाहिये | (30)   स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्ति पुष्टिवर्धनम् | एतत्सर्वं परित्यज्य गुरुमेव समाश्रयेत् ||   अपने आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रमादि) जाति, कीर्ति (पदप्रतिष्ठा), पालन-पोषण, ये सब छोड़ कर गुरुदेव का ही सम्यक् आश्रय लेना चाहिये | (31)   गुरुवक्त्रे स्थिता विद्या गुरुभक्त्या च लभ्यते | त्रैलोक्ये स्फ़ुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः ||   विद्या गुरुदेव के मुख में रहती है और वह गुरुदेव की भक्ति से ही प्राप्त होती है | यह बात तीनों लोकों में देव, ॠषि, पितृ और मानवों द्वारा स्पष्ट रूप से कही गई है | (32)   गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते | अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ||   ‘गु’ शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ शब्द का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान) | अज्ञान को नष्ट करनेवाल जो ब्रह्मरूप प्रकाश है वह गुरु है | इसमें कोई संशय नहीं है | (33)   गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत् | अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ||   ‘गु’ कार अंधकार है और उसको दूर करनेवाल ‘रु’ कार है | अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करने के कारण ही गुरु कहलाते हैं | (34)   गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः | गुणरूपविहीनत्वात् गुरुरित्यभिधीयते ||   ‘गु’ कार से गुणातीत कहा जता है, ‘रु’ कार से रूपातीत कहा जता है | गुण और रूप से पर होने के कारण ही गुरु कहलाते हैं | (35)   गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः | रुकारोऽस्ति परं ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम् ||   गुरु शब्द का प्रथम अक्षर गु माया आदि गुणों का प्रकाशक है और दूसरा अक्षर रु कार माया की भ्रान्ति से मुक्ति देनेवाला परब्रह्म है | (36)   सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम् | वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद् गुरुम् ||   गुरु सर्व श्रुतिरूप श्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरणकमलवाले हैं और वेदान्त के अर्थ के प्रवक्ता हैं | इसलिये श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये | (37)   यस्यस्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम् | सः एव सर्वसम्पत्तिः तस्मात्संपूजयेद् गुरुम् ||   जिनके स्मरण मात्र से ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है और वे ही सर्व (शमदमदि) सम्पदारूप हैं | अतः श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये | (38)   संसारवृक्षमारूढ़ाः पतन्ति नरकार्णवे | यस्तानुद्धरते सर्वान् तस्मै श्रीगुरवे नमः ||   संसाररूपी वृक्ष पर चढ़े हुए लोग नरकरूपी सागर में गिरते हैं | उन सबका उद्धार करनेवाले श्री गुरुदेव को नमस्कार हो | (39)   एक एव परो बन्धुर्विषमे समुपस्थिते | गुरुः सकलधर्मात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ||   जब विकट परिस्थिति उपस्थित होती है तब वे ही एकमात्र परम बांधव हैं और सब धर्मों के आत्मस्वरूप हैं | ऐसे श्रीगुरुदेव को नमस्कार हो | (40)   भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः | येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः ||   संसार रूपी अरण्य में प्रवेश करने के बाद दिग्मूढ़ की स्थिति में (जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है), चित्त भ्रमित हो जाता है , उस समय जिसने मार्ग दिखाया उन श्री गुरुदेव को नमस्कार हो | (41)   तापत्रयाग्नितप्तानां अशान्तप्राणीनां भुवि | गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरुवे नमः ||   इस पृथ्वी पर त्रिविध ताप (आधि-व्याधि-उपाधि) रूपी अग्नी से जलने के कारण अशांत हुए प्राणियों के लिए गुरुदेव ही एकमात्र उत्तम गंगाजी हैं | ऐसे श्री गुरुदेवजी को नमस्कार हो | (42)   सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत् | गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम् ||   सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान करने से जितना फल मिलता है वह फल श्रीगुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा है | (43)   शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन | लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत् ||   यदि शिवजी नारज़ हो जायें तो गुरुदेव बचानेवाले हैं, किन्तु यदि गुरुदेव नाराज़ हो जायें तो बचानेवाला कोई नहीं | अतः गुरुदेव को संप्राप्त करके सदा उनकी शरण में रेहना चाहिए | (44)   गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम् | गुणातीतमरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः ||   गुरु शब्द का गु अक्षर गुणातीत अर्थ का बोधक है और रु अक्षर रूपरहित स्थिति का बोधक है | ये दोनों (गुणातीत और रूपातीत) स्थितियाँ जो देते हैं उनको गुरु कहते हैं | (45)   अत्रिनेत्रः शिवः साक्षात् द्विबाहुश्च हरिः स्मृतः | योऽचतुर्वदनो ब्रह्मा श्रीगुरुः कथितः प्रिये ||   हे प्रिये !  गुरु ही त्रिनेत्ररहित (दो नेत्र वाले) साक्षात् शिव हैं, दो हाथ वाले भगवान विष्णु हैं और एक मुखवाले ब्रह्माजी हैं | (46)   देवकिन्नरगन्धर्वाः पितृयक्षास्तु तुम्बुरुः | मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम् ||   देव, किन्नर, गंधर्व, पितृ, यक्ष, तुम्बुरु (गंधर्व का एक प्रकार) और मुनि लोग भी गुरुसेवा की विधि नहीं जानते | (47)   तार्किकाश्छान्दसाश्चैव देवज्ञाः कर्मठः प्रिये | लौकिकास्ते न जानन्ति गुरुतत्वं निराकुलम् ||   हे प्रिये !  तार्किक, वैदिक, ज्योतिषि, कर्मकांडी तथा लोकिकजन निर्मल गुरुतत्व को नहीं जानते | (48)   यज्ञिनोऽपि न मुक्ताः स्युः न मुक्ताः योगिनस्तथा | तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराड्मुखाः ||   यदि गुरुतत्व से प्राड्मुख हो जाये तो याज्ञिक मुक्ति नहीं पा सकते, योगी मुक्त नहीं हो सकते और तपस्वी भी मुक्त नहीं हो सकते | (49)   न मुक्तास्तु गन्धर्वः पितृयक्षास्तु चारणाः | ॠष्यः सिद्धदेवाद्याः गुरुसेवापराड्मुखाः ||   गुरुसेवा से विमुख गंधर्व, पितृ, यक्ष, चारण, ॠषि, सिद्ध और देवता आदि भी मुक्त नहीं होंगे |   || इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां प्रथमोऽध्यायः ||     || अथ द्वितीयोऽध्यायः ||   ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् | एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम् भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||   दूसरा अध्याय   जो ब्रह्मानंदस्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख, दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ | (52)   गुरुपदिष्टमार्गेण मनः शिद्धिं तु कारयेत् | अनित्यं खण्डयेत्सर्वं यत्किंचिदात्मगोचरम् ||   श्री गुरुदेव के द्वारा उपदिष्ट मार्ग से मन की शुद्धि करनी चाहिए | जो कुछ भी अनित्य वस्तु अपनी इन्द्रियों की विषय हो जायें उनका खण्डन (निराकरण) करना चाहिए | (53)   किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि | दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम् ||   यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ ? श्री गुरुदेव की परम कृपा के बिना करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है | (54)   करुणाखड्गपातेन छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः | सम्यगानन्दजनकः सदगुरु सोऽभिधीयते || एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दा करोति यः | स याति नरकान् घोरान् यावच्चन्द्रदिवाकरौ ||   करुणारूपी तलवार के प्रहार से शिष्य के आठों पाशों (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा, प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति ) को काटकर निर्मल आनंद देनेवाले को सदगुरु कहते हैं | ऐसा सुनने पर भी जो मनुष्य गुरुनिन्दा करता है, वह (मनुष्य) जब तक सूर्यचन्द्र का अस्तित्व रहता है तब तक घोर नरक में रहता है | (55, 56)   यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरुं स्मरेत् | गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ||   हे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे तब तक श्री गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और आत्मज्ञानी होने के बाद भी (स्वच्छन्द अर्थात् स्वरूप का छन्द मिलने पर भी ) शिष्य को गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए | (57)   हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञशिष्यै कदाचन | गुरुराग्रे न वक्तव्यमसत्यं तु कदाचन ||   श्री गुरुदेव के समक्ष प्रज्ञावान् शिष्य को कभी हुँकार शब्द से (मैने ऐसे किया... वैसा किया ) नहीं बोलना चाहिए और कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए | (58)   गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुसान्निध्यभाषणः | अरण्ये निर्जले देशे संभवेद् ब्रह्मराक्षसः ||   गुरुदेव के समक्ष जो हुँकार शब्द से बोलता है अथवा गुरुदेव को तू कहकर जो बोलता है वह निर्जन मरुभूमि में ब्रह्मराक्षस होता है | (59)   अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा | कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ||   सदा और सर्व अवस्थाओं में अद्वैत की भावना करनी चाहिए परन्तु गुरुदेव के साथ अद्वैत की भावना कदापि नहीं करनी चाहिए | (60)   दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद् गुरुपदार्चनम् | तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिणः ||   जब तक दृश्य प्रपंच की विस्मृति न हो जाय तब तक गुरुदेव के पावन चरणारविन्द की पूजा-अर्चना करनी चाहिए | ऐसा करनेवाले को ही कैवल्यपद की प्रप्ति होती है, इसके विपरीत करनेवाले को नहीं होती | (61)   अपि संपूर्णतत्त्वज्ञो गुरुत्यागी भवेद्ददा | भवेत्येव हि तस्यान्तकाले विक्षेपमुत्कटम् ||   संपूर्ण तत्त्वज्ञ भी यदि गुरु का त्याग कर दे तो मृत्यु के समय उसे महान् विक्षेप अवश्य हो जाता है | (62)   गुरौ सति स्वयं देवी परेषां तु कदाचन | उपदेशं न वै कुर्यात् तदा चेद्राक्षसो भवेत् ||   हे देवी ! गुरु के रहने पर अपने आप कभी किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए | इस प्रकार उपदेश देनेवाला ब्रह्मराक्षस होता है | (63)   न गुरुराश्रमे कुर्यात् दुष्पानं परिसर्पणम् | दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि गुरोराज्ञां न कारयेत् ||   गुरु के आश्रम में नशा नहीं करना चाहिए, टहलना नहीं चाहिए | दीक्षा देना, व्याख्यान करना, प्रभुत्व दिखाना और गुरु को आज्ञा करना, ये सब निषिद्ध हैं | (64)   नोपाश्रमं च पर्यंकं न च पादप्रसारणम् | नांगभोगादिकं कुर्यान्न लीलामपरामपि ||   गुरु के आश्रम में अपना छप्पर और पलंग नहीं बनाना चाहिए, (गुरुदेव के सम्मुख) पैर नहीं पसारना, शरीर के भोग नहीं भोगने चाहिए और अन्य लीलाएँ नहीं करनी चाहिए | (65)   गुरुणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत् | कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद् गुरौ ||   गुरुओं की बात सच्ची हो या झूठी, परन्तु उसका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए | रात और दिन गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए उनके सान्निध्य में दास बन कर रहना चाहिए | (66)   अदत्तं न गुरोर्द्रव्यमुपभुंजीत कहिर्चित् | दत्तं च रंकवद् ग्राह्यं प्राणोप्येतेन लभ्यते ||   जो द्रव्य गुरुदेव ने नहीं दिया हो उसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए | गुरुदेव के दिये हुए द्रव्य को भी गरीब की तरह ग्रहण करना चाहिए | उससे प्राण भी प्राप्त हो सकते हैं | (67)   पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभिष्टितम् | नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत् क्वचित् ||   पादुका, आसन, बिस्तर आदि जो कुछ भी गुरुदेव के उपयोग में आते हों उन सर्व को नमस्कार करने चाहिए और उनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए | (68)   गच्छतः पृष्ठतो गच्छेत् गुरुच्छायां न लंघयेत् | नोल्बणं धारयेद्वेषं नालंकारास्ततोल्बणान् ||   चलते हुए गुरुदेव के पीछे चलना चाहिए, उनकी परछाईं का भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए | गुरुदेव के समक्ष कीमती वेशभूषा, आभूषण आदि धारण नहीं करने चाहिए | (69)   गुरुनिन्दाकरं दृष्ट्वा धावयेदथ वासयेत् | स्थानं वा तत्परित्याज्यं जिह्वाच्छेदाक्षमो यदि ||   गुरुदेव की निन्दा करनेवाले को देखकर यदि उसकी जिह्वा काट डालने में समर्थ न हो तो उसे अपने स्थान से भगा देना चाहिए | यदि वह ठहरे तो स्वयं उस स्थान का परित्याग करना चाहिए | (70)   मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैवा शापितो यदि | कालमृत्युभयाद्वापि गुरुः संत्राति पार्वति ||   हे पर्वती ! मुनियों पन्नगों और देवताओं के शाप से तथा यथा काल आये हुए मृत्यु के भय से भी शिष्य को गुरुदेव बचा सकते हैं | (71)   विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया | ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ||   गुरुदेव के श्रीचरणों की सेवा करके महावाक्य के अर्थ को जो समझते हैं वे ही सच्चे संन्यासी हैं, अन्य तो मात्र वेशधारी हैं | (72)   नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम् | भासयन् ब्रह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा ||   गुरु वे हैं जो नित्य, निर्गुण, निराकार, परम ब्रह्म का बोध देते हुए, जैसे एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्ज्वलित करता है वैसे, शिष्य में ब्रह्मभाव को प्रकटाते हैं | (73)   गुरुप्रादतः स्वात्मन्यात्मारामनिरिक्षणात् | समता मुक्तिमर्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्तते ||   श्री गुरुदेव की कृपा से अपने भीतर ही आत्मानंद प्राप्त करके समता और मुक्ति के मार्ग द्वार शिष्य आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है | (74)   स्फ़टिके स्फ़ाटिकं रूपं दर्पणे दर्पणो यथा | तथात्मनि चिदाकारमानन्दं सोऽहमित्युत ||   जैसे स्फ़टिक मणि में स्फ़टिक मणि तथा दर्पण में दर्पण दिख सकता है उसी प्रकार आत्मा में जो चित् और आनंदमय दिखाई देता है वह मैं हूँ | (75)   अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायेच्च चिन्मयं हृदि | तत्र स्फ़ुरति यो भावः श्रुणु तत्कथयामि ते ||   हृदय में अंगुष्ठ मात्र परिणाम वाले चैतन्य पुरुष का ध्यान करना चाहिए | वहाँ जो भाव स्फ़ुरित होता है वह मैं तुम्हें कहता हूँ, सुनो | (76)   अजोऽहममरोऽहं च ह्यनादिनिधनोह्यहम् | अविकारश्चिदानन्दो ह्यणियान् महतो महान् ||   मैं अजन्मा हूँ, मैं अमर हूँ, मेरा आदि नहीं है, मेरी मृत्यु नहीं है | मैं निर्विकार हूँ, मैं चिदानन्द हूँ, मैं अणु से भी छोटा हूँ और महान् से भी महान् हूँ | (77)   अपूर्वमपरं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम् | विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम् || अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम् | निःशब्दं तु विजानीयात्स्वाभावाद् ब्रह्म पर्वति ||   हे पर्वती ! ब्रह्म को स्वभाव से ही अपूर्व (जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा), अद्वितीय, नित्य, ज्योतिस्वरूप, निरोग, निर्मल, परम आकाशस्वरूप, अचल, आनन्दस्वरूप, अविनाशी, अगम्य, अगोचर, नाम-रूप से रहित तथा निःशब्द जानना चाहिए | (78, 79)   यथा गन्धस्वभावत्वं कर्पूरकुसुमादिषु | शीतोष्णस्वभावत्वं तथा ब्रह्मणि शाश्वतम् ||   जिस प्रकार कपूर, फ़ूल इत्यादि में गन्धत्व, (अग्नि में) उष्णता और (जल में) शीतलता स्वभाव से ही होते हैं उसी प्रकार ब्रह्म में शश्वतता भी स्वभावसिद्ध है | (80)   यथा निजस्वभावेन कुंडलकटकादयः | सुवर्णत्वेन तिष्ठन्ति तथाऽहं ब्रह्म शाश्वतम् ||   जिस प्रकार कटक, कुण्डल आदि आभूषण स्वभाव से ही सुवर्ण हैं उसी प्रकार मैं स्वभाव से ही शाश्वत ब्रह्म हूँ | (81)   स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित् | कीटो भृंग इव ध्यानात् यथा भवति तादृशः ||   स्वयं वैसा होकर किसी-न-किसी स्थान में रहना  | जैसे कीडा भ्रमर का चिन्तन करते-करते भ्रमर हो जाता है वैसे ही जीव ब्रह्म का धयान करते-करते ब्रह्मस्वरूप हो जाता है | (82)   गुरोर्ध्यानेनैव नित्यं देही ब्रह्ममयो भवेत् | स्थितश्च यत्रकुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः ||   सदा गुरुदेव का ध्यान करने से जीव ब्रह्ममय हो जाता है | वह किसी भी स्थान में रहता हो फ़िर भी मुक्त ही है | इसमें कोई संशय नहीं है | (83)   ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं यशः श्री समुदाहृतम् | षड्गुणैश्वर्ययुक्तो हि भगवान् श्री गुरुः प्रिये ||   हे प्रिये ! भगवत्स्वरूप श्री गुरुदेव ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश, लक्ष्मी और मधुरवाणी, ये छः गुणरूप ऐश्वर्य से संपन्न होते हैं | (84)   गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुर्बन्धुः शरीरिणाम् | गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरोरन्यन्न विद्यते ||   मनुष्य के लिए गुरु ही शिव हैं, गुरु ही देव हैं, गुरु ही बांधव हैं गुरु ही आत्मा हैं और गुरु ही जीव हैं  | (सचमुच) गुरु के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है | (85)   एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः | बाल्यभावेन यो भाति ब्रह्मज्ञानी स उच्यते ||   अकेला, कामनारहित, शांत, चिन्तारहित, ईर्ष्यारहित और बालक की तरह जो शोभता है वह ब्रह्मज्ञानी कहलाता है | (86)   न सुखं वेदशास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके | गुरोः प्रसादादन्यत्र सुखं नास्ति महीतले ||   वेदों और शास्त्रों में सुख नहीं है, मंत्र और यंत्र में सुख नहीं है | इस पृथ्वी पर गुरुदेव के कृपाप्रसाद के सिवा अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं है | (87)   चावार्कवैष्णवमते सुखं प्रभाकरे न हि | गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम् ||   गुरुदेव के श्री चरणों में जो वेदान्तनिर्दिष्ट सुख है वह सुख न चावार्क मत में, न वैष्णव मत में और न प्रभाकर (सांखय) मत में है | (88)   न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम् | यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः ||   एकान्तवासी वीतराग मुनि को जो सुख मिलता है वह सुख न इन्द्र को और न चक्रवर्ती राजाओं को मिलता है | (89)   नित्यं ब्रह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि | इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा ||   हमेशा ब्रह्मरस का पान करके जो परमात्मा में तृप्त हो गया है वह (मुनि) इन्द्र को भी गरीब मानता है तो राजाओं की तो बात ही क्या ? (90)   यतः परमकैवल्यं गुरुमार्गेण वै भवेत् | गुरुभक्तिरतिः कार्या सर्वदा मोक्षकांक्षिभिः ||   मोक्ष की आकांक्षा करनेवालों को गुरुभक्ति खूब करनी चाहिए, क्योंकि गुरुदेव के द्वारा ही परम मोक्ष की प्राप्ति होती है | (91)   एक एवाद्वितीयोऽहं गुरुवाक्येन निश्चितः || एवमभ्यास्ता नित्यं न सेव्यं वै वनान्तरम् || अभ्यासान्निमिषणैव समाधिमधिगच्छति | आजन्मजनितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ||   गुरुदेव के वाक्य की सहायता से जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है कि मैं एक और अद्वितीय हूँ और उसी अभ्यास में जो रत है उसके लिए अन्य वनवास का सेवन आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभ्यास से ही एक क्षण में समाधि लग जाती है और उसी क्षण इस जन्म तक के सब पाप नष्ट हो जाते हैं | (92, 93)   गुरुर्विष्णुः सत्त्वमयो राजसश्चतुराननः | तामसो रूद्ररूपेण सृजत्यवति हन्ति च ||   गुरुदेव ही सत्वगुणी होकर विष्णुरूप से जगत का पालन करते हैं, रजोगुणी होकर ब्रह्मारूप से जगत का सर्जन करते हैं और तमोगुणी होकर शंकर रूप से जगत का संहार करते हैं | (94)   तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः | एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ||   उनका (गुरुदेव का) दर्शन पाकर, उनके कृपाप्रसाद से सर्व प्रकार की आसक्ति छोड़कर एकाकी, निःस्पृह और शान्त होकर रहना चाहिए | (95)   सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो भुवि | सदाऽनन्दः सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित् ||   जो जीव इस जगत में सर्वमय, आनंदमय और शान्त होकर सर्वत्र विचरता है उस जीव को सर्वज्ञ कहते हैं | (96)   यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनः | मुक्तस्य लक्षणं देवी तवाग्रे कथितं मया ||   ऐसा पुरुष जहाँ रहता है वह स्थान पुण्यतीर्थ है | हे देवी ! तुम्हारे सामने मैंने मुक्त पुरूष का लक्षण कहा | (97)   यद्यप्यधीता निगमाः षडंगा आगमाः प्रिये | आध्यामादिनि शास्त्राणि ज्ञानं नास्ति गुरुं विना ||   हे प्रिये ! मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, वेद के छः अंग पढ़ ले, आध्यात्मशास्त्र आदि अन्य सर्व शास्त्र पढ़ ले फ़िर भी गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता | (98)   शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा | गुरुतत्वविहीनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि ||   शिवजी की पूजा में रत हो या विष्णु की पूजा में रत हो, परन्तु गुरुतत्व के ज्ञान से रहित हो तो वह सब व्यर्थ है | (99)   सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः | गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः ||   गुरुदेव की दीक्षा के प्रभाव से सब कर्म सफल होते हैं | गुरुदेव की संप्राप्ति रूपी परम लाभ से अन्य सर्वलाभ मिलते हैं | जिसका गुरु नहीं वह मूर्ख है | (100)   तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वसंगविवर्जितः | विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव समाश्रयेत् ||   इसलिए सब प्रकार के प्रयत्न से अनासक्त होकर , शास्त्र की मायाजाल छोड़कर गुरुदेव की ही शरण लेनी चाहिए | (101)   ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः | स्वविश्रान्ति न जानाति परशान्तिं करोति किम् ||   ज्ञानरहित, मिथ्या बोलनेवाले और दिखावट करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि जो अपनी ही शांति पाना नहीं जानता वह दूसरों को क्या शांति दे सकेगा | (102)   शिलायाः किं परं ज्ञानं शिलासंघप्रतारणे | स्वयं तर्तुं न जानाति परं निसतारेयेत्कथम् ||   पत्थरों के समूह को तैराने का ज्ञान पत्थर में कहाँ से हो सकता है ? जो खुद तैरना नहीं जानता वह दूसरों को क्या तैरायेगा | (103)   न वन्दनीयास्ते कष्टं दर्शनाद् भ्रान्तिकारकः | वर्जयेतान् गुरुन् दूरे धीरानेव समाश्रयेत् ||   जो गुरु अपने दर्शन से (दिखावे से) शिष्य को भ्रान्ति में ड़ालता है ऐसे गुरु को प्रणाम नहीं करना चाहिए | इतना ही नहीं दूर से ही उसका त्याग करना चाहिए | ऐसी स्थिति में धैर्यवान् गुरु का ही आश्रय लेना चाहिए | (104)   पाखण्डिनः पापरता नास्तिका भेदबुद्धयः | स्त्रीलम्पटा दुराचाराः कृतघ्ना बकवृतयः || कर्मभ्रष्टाः क्षमानष्टाः निन्द्यतर्कैश्च वादिनः | कामिनः क्रोधिनश्चैव हिंस्राश्चंड़ाः शठस्तथा || ज्ञानलुप्ता न कर्तव्या महापापास्तथा प्रिये | एभ्यो भिन्नो गुरुः सेव्य एकभक्त्या विचार्य च ||   भेदबुद्धि उत्तन्न करनेवाले, स्त्रीलम्पट, दुराचारी, नमकहराम, बगुले की तरह ठगनेवाले, क्षमा रहित निन्दनीय तर्कों से वितंडावाद करनेवाले, कामी क्रोधी, हिंसक, उग्र, शठ तथा अज्ञानी और महापापी पुरुष को गुरु नहीं करना चाहिए | ऐसा विचार करके ऊपर दिये लक्षणों से भिन्न लक्षणोंवाले गुरु की एकनिष्ठ भक्ति से सेवा करनी चाहिए | (105, 106, 107 )   सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मसारं मयोदितम् | गुरुगीता समं स्तोत्रं नास्ति तत्वं गुरोः परम् ||   गुरुगीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है | गुरु के समान अन्य कोई तत्व नहीं है | समग्र धर्म का यह सार मैंने कहा है, यह सत्य है, सत्य है और बार-बार सत्य है | (108)   अनेन यद् भवेद् कार्यं तद्वदामि तव प्रिये | लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु विवर्जयेत् ||   हे प्रिये ! इस गुरुगीता का पाठ करने से जो कार्य सिद्ध होता है अब वह कहता हूँ | हे देवी ! लोगों के लिए यह उपकारक है | मात्र लौकिक का त्याग करना चाहिए | (109)   लौकिकाद्धर्मतो याति ज्ञानहीनो भवार्णवे | ज्ञानभावे च यत्सर्वं कर्म निष्कर्म शाम्यति ||   जो कोई इसका उपयोग लौकिक कार्य के लिए करेगा वह ज्ञानहीन होकर संसाररूपी सागर में गिरेगा | ज्ञान भाव से जिस कर्म में इसका उपयोग किया जाएगा वह कर्म निष्कर्म में परिणत होकर शांत हो जाएगा | (110)   इमां तु भक्तिभावेन पठेद्वै शृणुयादपि | लिखित्वा यत्प्रसादेन तत्सर्वं फलमश्नुते ||   भक्ति भाव से इस गुरुगीता का पाठ करने से, सुनने से और लिखने से वह (भक्त) सब फल भोगता है | (111)   गुरुगीतामिमां देवि हृदि नित्यं विभावय | महाव्याधिगतैदुःखैः सर्वदा प्रजपेन्मुदा ||   हे देवी ! इस गुरुगीता को नित्य भावपूर्वक हृदय में धारण करो | महाव्याधिवाले दुःखी लोगों को सदा आनंद से इसका जप करना चाहिए | (112)   गुरुगीताक्षरैकैकं मंत्रराजमिदं प्रिये | अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोड्शीम् ||   हे प्रिये ! गुरुगीता का एक-एक अक्षर मंत्रराज है | अन्य जो विविध मंत्र हैं वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं | (113)   अनन्तफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु | सर्वपापहरा देवि सर्वदारिद्रयनाशिनी ||   हे देवी ! गुरुगीता के जप से अनंत फल मिलता है | गुरुगीता सर्व पाप को हरने वाली और सर्व दारिद्रय का नाश करने वाली है | (114)   अकालमृत्युहंत्री च सर्वसंकटनाशिनी | यक्षराक्षसभूतादिचोरव्याघ्रविघातिनी ||   गुरुगीता अकाल मृत्यु को रोकती है, सब संकटों का नाश करती है, यक्ष राक्षस, भूत, चोर और बाघ आदि का घात करती है | (115)   सर्वोपद्रवकुष्ठदिदुष्टदोषनिवारिणी | यत्फलं गुरुसान्निध्यात्तत्फलं पठनाद् भवेत् ||   गुरुगीता सब प्रकार के उपद्रवों, कुष्ठ और दुष्ट रोगों और दोषों का निवारण करनेवाली है | श्री गुरुदेव के सान्निध्य से जो फल मिलता है वह फल इस गुरुगीता का पाठ करने से मिलता है | (116)   महाव्याधिहरा सर्वविभूतेः सिद्धिदा भवेत् | अथवा मोहने वश्ये स्वयमेव जपेत्सदा ||   इस गुरुगीता का पाठ करने से महाव्याधि दूर होती है, सर्व ऐश्वर्य और सिद्धियों की प्राप्ति होती है | मोहन में अथवा वशीकरण में इसका पाठ स्वयं ही करना चाहिए | (117)   मोहनं सर्वभूतानां बन्धमोक्षकरं परम् | देवराज्ञां प्रियकरं राजानं वश्मानयेत् ||   इस गुरुगीता का पाठ करनेवाले पर सर्व प्राणी मोहित हो जाते हैं बन्धन में से परम मुक्ति मिलती है, देवराज इन्द्र को वह प्रिय होता है और राजा उसके वश होता है | (118)   मुखस्तम्भकरं चैव गुणाणां च विवर्धनम् | दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत्कर्मसिद्धिदम् ||   इस गुरुगीता का पाठ शत्रु का मुख बन्द करनेवाला है, गुणों की वृद्धि करनेवाला है, दुष्कृत्यों का नाश करनेवाला और सत्कर्म में सिद्धि देनेवाला है | (119)   असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयापहम् | दुःस्वप्ननाशनं चैव सुस्वप्नफलदायकम् ||   इसका पाठ असाध्य कार्यों की सिद्धि कराता है, नव ग्रहों का भय हरता है, दुःस्वप्न का नाश करता है और सुस्वप्न के फल की प्राप्ति कराता है | (120)   मोहशान्तिकरं चैव बन्धमोक्षकरं परम् | स्वरूपज्ञाननिलयं गीतशास्त्रमिदं शिवे ||   हे शिवे ! यह गुरुगीतारूपी शास्त्र मोह को शान्त करनेवाला, बन्धन में से परम मुक्त करनेवाला और स्वरूपज्ञान का भण्डार है | (121)   यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चयम् | नित्यं सौभाग्यदं पुण्यं तापत्रयकुलापहम् ||   व्यक्ति जो-जो अभिलाषा करके इस गुरुगीता का पठन-चिन्तन करता है उसे वह निश्चय ही प्राप्त होता है | यह गुरुगीता नित्य सौभाग्य और पुण्य प्रदान करनेवाली तथा तीनों तापों (आधि-व्याधि-उपाधि) का शमन करनेवाली है | (122)   सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वन्ध्यासुपुत्रदम् | अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यस्य विवर्धनम् ||   यह गुरुगीता सब प्रकार की शांति करनेवाली, वन्ध्या स्त्री को सुपुत्र देनेवाली, सधवा स्त्री के वैध्व्य का निवारण करनेवाली और सौभाग्य की वृद्धि करनेवाली है  | (123)   आयुरारोग्मैश्वर्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् | निष्कामजापी विधवा पठेन्मोक्षमवाप्नुयात् ||   यह गुरुगीता आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और पुत्र-पौत्र की वृद्धि करनेवाली है | कोई विधवा निष्काम भाव से इसका जप-पाठ करे तो मोक्ष की प्राप्ति होती है | (124)   अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि | सर्वदुःखभयं विघ्नं नाश्येत्तापहारकम् ||   यदि वह (विधवा) सकाम होकर जप करे तो अगले जन्म में उसको संताप हरनेवाल अवैध्व्य (सौभाग्य) प्राप्त होता है | उसके सब दुःख भय, विघ्न और संताप का नाश होता है | (125)   सर्वपापप्रशमनं धर्मकामार्थमोक्षदम् | यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ||   इस गुरुगीता का पाठ सब पापों का शमन करता है, धर्म, अर्थ, और मोक्ष की प्राप्ति कराता है | इसके पाठ से जो-जो आकांक्षा की जाती है वह अवश्य सिद्ध होती है | (126)   लिखित्वा पूजयेद्यस्तु मोक्षश्रियम्वाप्नुयात् | गुरूभक्तिर्विशेषेण जायते हृदि सर्वदा ||   यदि कोई इस गुरुगीता को लिखकर उसकी पूजा करे तो उसे लक्ष्मी और मोक्ष की प्राप्ति होती है और विशेष कर उसके हृदय में सर्वदा गुरुभक्ति उत्पन्न होती रहती है | (127)   जपन्ति शाक्ताः सौराश्च गाणपत्याश्च वैष्णवाः | शैवाः पाशुपताः सर्वे सत्यं सत्यं न संशयः ||   शक्ति के, सूर्य के, गणपति के, शिव के और पशुपति के मतवादी इसका (गुरुगीता का) पाठ करते हैं यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं है | (128)   जपं हीनासनं कुर्वन् हीनकर्माफलप्रदम् | गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे || जपन् जयमवाप्नोति मरणे मुक्तिदायिका | सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः ||   बिना आसन किया हुआ जप नीच कर्म हो जाता है और निष्फल हो जाता है | यात्रा में, युद्ध में, शत्रुओं के उपद्रव में गुरुगीता का जप-पाठ करने से विजय मिलता है | मरणकाल में जप करने से मोक्ष मिलता है | गुरुपुत्र के (शिष्य के) सर्व कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संदेह नहीं है | (129, 130)   गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा | दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके ||   जिसके मुख में गुरुमंत्र है उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं | दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं | (131)   भवमूलविनाशाय चाष्टपाशनिवृतये | गुरुगीताम्भसि स्नानं तत्वज्ञ कुरुते सदा || सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति | तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रपीठे चरन्ति च ||   तत्वज्ञ पुरूष संसारूपी वृक्ष की जड़ नष्ट करने के लिए और आठों प्रकार के बन्धन (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति) की निवृति करने के लिए गुरुगीता रूपी गंगा में सदा स्नान करते रहते हैं | स्वभाव से ही सर्वथा शुद्ध और पवित्र ऐसे वे महापुरूष जहाँ रहते हैं उस तीर्थ में देवता विचरण करते हैं  | (132, 133)   आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठन्तोऽपि वा | अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा सुषुप्ता जाग्रतोऽपि वा || शुचिभूता ज्ञानवन्तो गुरुगीतां जपन्ति ये | तेषां दर्शनसंस्पर्शात् पुनर्जन्म न विद्यते ||   आसन पर बैठे हुए या लेटे हुए, खड़े रहते या चलते हुए, हाथी या घोड़े पर सवार, जाग्रतवस्था में या सुषुप्तावस्था में , जो पवित्र ज्ञानवान् पुरूष इस गुरुगीता का जप-पाठ करते हैं उनके दर्शन और स्पर्श से पुनर्जन्म नहीं होता | (134, 135)   कुशदुर्वासने देवि ह्यासने शुभ्रकम्बले | उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ||   हे देवी ! कुश और दुर्वा के आसन पर सफ़ेद कम्बल बिछाकर उसके ऊपर बैठकर एकाग्र मन से इसका (गुरुगीता का) जप करना चाहिए (136)   शुक्लं सर्वत्र वै प्रोक्तं वश्ये रक्तासनं प्रिये | पद्मासने जपेन्नित्यं शान्तिवश्यकरं परम् ||   सामन्यतया सफ़ेद आसन उचित है परंतु वशीकरण में लाल आसन आवश्यक है | हे प्रिये ! शांति प्राप्ति के लिए या वशीकरण में नित्य पद्मासन में बैठकर जप करना चाहिए | (137)   वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसंभवः | मेदिन्यां दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलम् ||   कपड़े के आसन पर बैठकर जप करने से दारिद्रय आता है, पत्थर के आसन पर रोग, भूमि पर बैठकर जप करने से दुःख आता है और लकड़ी के आसन पर किये हुए जप निष्फल होते हैं | (138)   कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिः मोक्षश्री व्याघ्रचर्मणि | कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले ||   काले मृगचर्म और दर्भासन पर बैठकर जप करने से ज्ञानसिद्धि होती है, व्याग्रचर्म पर जप करने से मुक्ति प्राप्त होती है, परन्तु कम्बल के आसन पर सर्व सिद्धि प्राप्त होती है | (139)   आग्नेय्यां कर्षणं चैव वयव्यां शत्रुनाशनम् | नैरॄत्यां दर्शनं चैव ईशान्यां ज्ञानमेव च ||   अग्नि कोण की तरफ मुख करके जप-पाठ करने से आकर्षण, वायव्य कोण की तरफ़ शत्रुओं का नाश, नैरॄत्य कोण की तरफ दर्शन और ईशान कोण की तरफ मुख करके जप-पाठ करने से ज्ञान की प्रप्ति है | (140)   उदंमुखः शान्तिजाप्ये वश्ये पूर्वमुखतथा | याम्ये तु मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः ||   उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करने से शांति, पूर्व दिशा की ओर वशीकरण, दक्षिण दिशा की ओर मारण सिद्ध होता है तथा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप-पाठ करने से धन प्राप्ति होती है | (141)   || इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां द्वितीयोऽध्यायः  ||   || अथ तृतीयोऽध्यायः ||   अथ काम्यजपस्थानं कथयामि वरानने | सागरान्ते सरित्तीरे तीर्थे हरिहरालये || शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे | वटस्य धात्र्या मूले व मठे वृन्दावने तथा || पवित्रे निर्मले देशे नित्यानुष्ठानोऽपि वा | निर्वेदनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत् ||   तीसरा अध्याय   हे सुमुखी ! अब सकामियों के लिए जप करने के स्थानों का वर्णन करता हूँ | सागर या नदी के तट पर, तीर्थ में, शिवालय में, विष्णु के या देवी के मंदिर में, गौशाला में, सभी शुभ देवालयों में, वटवृक्ष के या आँवले के वृक्ष के नीचे, मठ में, तुलसीवन में, पवित्र निर्मल स्थान में, नित्यानुष्ठान के रूप में अनासक्त रहकर मौनपूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए |   जाप्येन जयमाप्नोति जपसिद्धिं फलं तथा | हीनकर्म त्यजेत्सर्वं गर्हितस्थानमेव च ||   जप से जय प्राप्त होता है तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है | जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए | (145)   स्मशाने बिल्वमूले वा वटमूलान्तिके तथा | सिद्धयन्ति कानके मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ ||   स्मशान में, बिल्व, वटवृक्ष या कनकवृक्ष के नीचे और आम्रवृक्ष के पास जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है | (146)   आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः | ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः ||   हे देवी ! कल्प पर्यन्त के, करोंड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ, ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं | (147)   मंदभाग्या ह्यशक्ताश्च ये जना नानुमन्वते | गुरुसेवासु विमुखाः पच्यन्ते नरकेऽशुचौ ||   भाग्यहीन, शक्तिहीन और गुरुसेवा से विमुख जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते वे घोर नरक में पड़ते हैं | (148)   विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम् | येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति ||   जिसके ऊपर श्री गुरुदेव की कृपा नहीं है उसकी विद्या, धन, बल और भाग्य निरर्थक है| हे पार्वती ! उसका अधःपतन होता है | (149)   धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः| धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता ||   जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है | (150)   शरीरमिन्द्रियं प्राणच्चार्थः स्वजनबन्धुतां | मातृकुलं पितृकुलं गुरुरेव न संशयः ||   शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, धन, स्वजन, बन्धु-बान्धव, माता का कुल, पिता का कुल ये सब गुरुदेव ही हैं | इसमें संशय नहीं है | (151)   गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः | गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ||   गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है | गुरु से अधिक और कुछ नहीं है यह मैं तीन बार कहता हूँ | (152)   समुद्रे वै यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम् | भिन्ने कुंभे यथाऽऽकाशं तथाऽऽत्मा परमात्मनि ||   जिस प्रकार सागर में पानी, दूध में दूध, घी में घी, अलग-अलग घटों में आकाश एक और अभिन्न है उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है | (153)   तथैव ज्ञानवान् जीव परमात्मनि सर्वदा | ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानिशम् ||   इसी प्रकार ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ अभिन्न होकर रात-दिन आनंदविभोर होकर सर्वत्र विचरते हैं | (154)   गुरुसन्तोषणादेव मुक्तो भवति पार्वति | अणिमादिषु भोक्तृत्वं कृपया देवि जायते ||   हे पार्वति ! गुरुदेव को संतुष्ट करने से शिष्य मुक्त हो जाता है | हे देवी ! गुरुदेव की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है| (155)   साम्येन रमते ज्ञानी दिवा वा यदि वा निशि | एवं विधौ महामौनी त्रैलोक्यसमतां व्रजेत् ||   ज्ञानी दिन में या रात में, सदा सर्वदा समत्व में रमण करते हैं | इस प्रकार के महामौनी अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं | (156)   गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थं निरर्थकम् | सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम् ||   गुरुभक्ति ही सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है | अन्य तीर्थ निरर्थक हैं | हे देवी ! गुरुदेव के चरणकमल सर्वतीर्थमय हैं | (157)   कन्याभोगरतामन्दाः स्वकान्तायाः पराड्मुखाः | अतः परं मया देवि कथितन्न मम प्रिये ||   हे देवी ! हे प्रिये ! कन्या के भोग में रत, स्वस्त्री से विमुख (परस्त्रीगामी) ऐसे बुद्धिशून्य लोगों को मेरा यह आत्मप्रिय परमबोध मैंने नहीं कहा | (158)   अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिषु | मनसाऽपि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन ||   अभक्त, कपटी, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक इत्यादि को यह गुरुगीता कहने का मन में सोचना तक नहीं | (159)   गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः | तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यह्यत्तापहारकम् ||   शिष्य के धन को अपहरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं लेकिन शिष्य के हृदय का संताप हरनेवाला एक गुरु भी दुर्लभ है ऐसा मैं मानता हूँ | (160)   चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः | मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते ||   जो चतुर हों, विवेकी हों, अध्यात्म के ज्ञाता हों, पवित्र हों तथा निर्मल मानसवाले हों उनमें गुरुत्व शोभा पाता है | (161)   गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः | कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः ||   गुरु निर्मल, शांत, साधु स्वभाव के, मितभाषी, काम-क्रोध से अत्यंत रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं | (162)   सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः | स्वयं समयक् परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ||   सूचक आदि भेद से अनेक गुरु कहे गये हैं | बिद्धिमान् मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वनिष्ठ सदगुरु की शरण लेनी चाहिए| (163)   वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम् | यस्मिन् देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ||   हे देवी ! वर्ण और अक्षरों से सिद्ध करनेवाले बाह्य लौकिक शास्त्रों का जिसको अभ्यास हो वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है| (164)   वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्मविधायिनीम् | प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति ||   हे पार्वती ! धर्माधर्म का विधान करनेवाली, वर्ण और आश्रम के अनुसार विद्या का प्रवचन करनेवाले गुरु को तुम वाचक गुरु जानो | (165)   पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति | स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः ||   पंचाक्षरी आदि मंत्रों का उपदेश देनेवाले गुरु बोधक गुरु कहलाते हैं | हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं | (166)   मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम् | निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः ||   मोहन, मारण, वशीकरण आदि तुच्छ मंत्रों को बतानेवाले गुरु को तत्वदर्शी पंडित निषिद्ध गुरु कहते हैं | (167)   अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम् | वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ||   हे प्रिये ! संसार अनित्य और दुःखों का घर है ऐसा समझाकर जो गुरु वैराग्य का मार्ग बताते हैं वे विहित गुरु कहलाते हैं | (168)   तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति | कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः ||   हे पार्वती ! तत्वमसि आदि महावाक्यों का उपदेश देनेवाले तथा संसाररूपी रोगों का निवारण करनेवाले गुरु कारणाख्य गुरु कहलाते हैं | (169)   सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः | जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ||   सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परम गुरु कहलाते हैं, सदगुरु कहलाते हैं | (170)   बहुजन्मकृतात् पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः | लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम् ||   अनेक जन्मों के किये हुए पुण्यों से ऐसे महागुरु प्राप्त होते हैं | उनको प्राप्त कर शिष्य पुनः संसारबन्धन में नहीं बँधता अर्थात् मुक्त हो जाता है | (171)   एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति | तेषु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ||   हे पर्वती ! इस प्रकार संसार में अनेक प्रकार के गुरु होते हैं | इन सबमें एक परम गुरु का ही सेवन सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए | (172)   पार्वत्युवाच स्वयं मूढा मृत्युभीताः सुकृताद्विरतिं गताः | दैवन्निषिद्धगुरुगा यदि तेषां तु का गतिः ||   पर्वती ने कहा प्रकृति से ही मूढ, मृत्यु से भयभीत, सत्कर्म से विमुख लोग यदि दैवयोग से निषिद्ध गुरु का सेवन करें तो उनकी क्या गति होती है | (173)   श्रीमहादेव उवाच   निषिद्धगुरुशिष्यस्तु दुष्टसंकल्पदूषितः | ब्रह्मप्रलयपर्यन्तं न पुनर्याति मृत्यताम् ||   श्री महादेवजी बोले निषिद्ध गुरु का शिष्य दुष्ट संकल्पों से दूषित होने के कारण ब्रह्मप्रलय तक मनुष्य नहीं होता, पशुयोनि में ही रहता है | (174)   श्रृणु तत्वमिदं देवि यदा स्याद्विरतो नरः | तदाऽसावधिकारीति प्रोच्यते श्रुतमस्तकैः ||   हे देवी ! इस तत्व को ध्यान से सुनो | मनुष्य जब विरक्त होता है तभी वह अधिकारी कहलाता है, ऐसा उपनिषद कहते हैं | अर्थात् दैव योग से गुरु प्राप्त होने की बात अलग है और विचार से गुरु चुनने की बात अलग है | (175)   अखण्डैकरसं ब्रह्म नित्यमुक्तं निरामयम् | स्वस्मिन संदर्शितं येन स भवेदस्य देशिकः ||   अखण्ड, एकरस, नित्यमुक्त और निरामय ब्रह्म जो अपने अंदर ही दिखाते हैं वे ही गुरु होने चाहिए | (176)   जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति | गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ||   हे पार्वती ! जिस प्रकार जलाशयों में सागर राजा है उसी प्रकार सब गुरुओं में से ये परम गुरु राजा हैं | (177)   मोहादिरहितः शान्तो नित्यतृप्तो निराश्रयः | तृणीकृतब्रह्मविष्णुवैभवः परमो गुरुः ||   मोहादि दोषों से रहित, शांत, नित्य तृप्त, किसीके आश्रयरहित अर्थात् स्वाश्रयी, ब्रह्मा और विष्णु के वैभव को भी तृणवत् समझनेवाले गुरु ही परम गुरु हैं | (178)   सर्वकालविदेशेषु स्वतंत्रो निश्चलस्सुखी | अखण्डैकरसास्वादतृप्तो हि परमो गुरुः ||   सर्व काल और देश में स्वतंत्र, निश्चल, सुखी, अखण्ड, एक रस के आनन्द से तृप्त ही सचमुच परम गुरु हैं | (179)   द्वैताद्वैतविनिर्मुक्तः स्वानुभूतिप्रकाशवान् | अज्ञानान्धमश्छेत्ता सर्वज्ञ परमो गुरुः ||   द्वैत और अद्वैत से मुक्त, अपने अनुभुवरूप प्रकाशवाले, अज्ञानरूपी अंधकार को छेदनेवाले और सर्वज्ञ ही परम गुरु हैं | (180)   यस्य दर्शनमात्रेण मनसः स्यात् प्रसन्नता | स्वयं भूयात् धृतिश्शान्तिः स भवेत् परमो गुरुः ||   जिनके दर्शनमात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती है वे परम गुरु हैं | (181)   स्वशरीरं शवं पश्यन् तथा स्वात्मानमद्वयम् | यः स्त्रीकनकमोहघ्नः स भवेत् परमो गुरुः ||   जो अपने शरीर को शव समान समझते हैं अपने आत्मा को अद्वय जानते हैं, जो कामिनी और कंचन के मोह का नाशकर्ता हैं वे परम गुरु हैं | (182)   मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्विधाभूच्छृणु पार्वति | न कश्चिन्मौनिना लाभो लोकेऽस्मिन्भवति प्रिये || वाग्मी तूत्कटसंसारसागरोत्तारणक्षमः | यतोऽसौ संशयच्छेत्ता शास्त्रयुक्त्यनुभूतिभिः ||   हे पार्वती ! सुनो | तत्वज्ञ दो प्रकार के होते हैं | मौनी और वक्ता | हे प्रिये ! इन दोंनों में से मौनी गुरु द्वारा लोगों को कोई लाभ नहीं होता, परन्तु वक्ता गुरु भयंकर संसारसागर को पार कराने में समर्थ होते हैं | क्योंकि शास्त्र, युक्ति (तर्क) और अनुभूति से वे सर्व संशयों का छेदन करते हैं | (183, 184)   गुरुनामजपाद्येवि बहुजन्मार्जितान्यपि | पापानि विलयं यान्ति नास्ति सन्देहमण्वपि ||   हे देवी ! गुरुनाम के जप से अनेक जन्मों के इकठ्ठे हुए पाप भी नष्ट होते हैं, इसमें अणुमात्र संशय नहीं है | (185)   कुलं धनं बलं शास्त्रं बान्धवास्सोदरा इमे | मरणे नोपयुज्यन्ते गुरुरेको हि तारकः ||   अपना कुल, धन, बल, शास्त्र, नाते-रिश्तेदार, भाई, ये सब मृत्यु के अवसर पर काम नहीं आते | एकमात्र गुरुदेव ही उस समय तारणहार हैं | (186)   कुलमेव पवित्रं स्यात् सत्यं स्वगुरुसेवया | तृप्ताः स्युस्स्कला देवा ब्रह्माद्या गुरुतर्पणात् ||   सचमुच, अपने गुरुदेव की सेवा करने से अपना कुल भी पवित्र होता है | गुरुदेव के तर्पण से ब्रह्मा आदि सब देव तृप्त होते हैं | (187)   स्वरूपज्ञानशून्येन कृतमप्यकृतं भवेत् | तपो जपादिकं देवि सकलं बालजल्पवत् ||   हे देवी ! स्वरूप के ज्ञान के बिना किये हुए जप-तपादि सब कुछ नहीं किये हुए के बराबर हैं, बालक के बकवाद के समान (व्यर्थ) हैं | (188)   न जानन्ति परं तत्वं गुरुदीक्षापराड्मुखाः | भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः ||   गुरुदीक्षा से विमुख रहे हुए लोग भ्रांत हैं, अपने वास्तविक ज्ञान से रहित हैं | वे सचमुच पशु के समान हैं | परम तत्व को वे नहीं जानते | (189)   तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थं गुरुमेव भजेत्प्रिये | गुरुं विना न जानन्ति मूढास्तत्परमं पदम् ||   इसलिये हे प्रिये ! कैवल्य की सिद्धि के लिए गुरु का ही भजन करना चाहिए | गुरु के बिना मूढ लोग उस परम पद को नहीं जान सकते | (190)   भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः | क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे ||   हे शिवे ! गुरुदेव की कृपा से हृदय की ग्रन्थि छिन्न हो जाती है, सब संशय कट जाते हैं और सर्व कर्म नष्ट हो जाते हैं | (191)   कृताया गुरुभक्तेस्तु वेदशास्त्रनुसारतः | मुच्यते पातकाद् घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः ||   वेद और शास्त्र के अनुसार विशेष रूप से गुरु की भक्ति करने से गुरुभक्त घोर पाप से भी मुक्त हो जाता है | (192)   दुःसंगं च परित्यज्य पापकर्म परित्यजेत् | चित्तचिह्नमिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ||   दुर्जनों का संग त्यागकर पापकर्म छोड़ देने चाहिए | जिसके चित्त में ऐसा चिह्न देखा जाता है उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है | (193)   चित्तत्यागनियुक्तश्च क्रोधगर्वविवर्जितः | द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा विधीयते ||   चित्त का त्याग करने में जो प्रयत्नशील है, क्रोध और गर्व से रहित है, द्वैतभाव का जिसने त्याग किया है उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है | (194)   एतल्लक्षणसंयुक्तं सर्वभूतहिते रतम् | निर्मलं जीवितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ||   जिसका जीवन इन लक्षणों से युक्त हो, निर्मल हो, जो सब जीवों के कल्याण में रत हो उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है | (195)   अत्यन्तचित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियुतस्य च | प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मप्रीतये सदा ||   हे देवी ! जिसका चित्त अत्यन्त परिपक्व हो, श्रद्धा और भक्ति से युक्त हो उसे यह तत्व सदा मेरी प्रसन्नता के लिए कहना चाहिए | (196)   सत्कर्मपरिपाकाच्च चित्तशुद्धस्य धीमतः | साधकस्यैव वक्तव्या गुरुगीता प्रयत्नतः ||   सत्कर्म के परिपाक से शुद्ध हुए चित्तवाले बुद्धिमान् साधक को ही गुरुगीता प्रयत्नपूर्वक कहनी चाहिए | (197)   नास्तिकाय कृतघ्नाय दांभिकाय शठाय च | अभक्ताय विभक्ताय न वाच्येयं कदाचन ||   नास्तिक, कृतघ्न, दंभी, शठ, अभक्त और विरोधी को यह गुरुगीता कदापि नहीं कहनी चाहिए | (198)   स्त्रीलोलुपाय मूर्खाय कामोपहतचेतसे | निन्दकाय न वक्तव्या गुरुगीतास्वभावतः ||   स्त्रीलम्पट, मूर्ख, कामवासना से ग्रस्त चित्तवाले तथा निंदक को गुरुगीता बिलकुल नहीं कहनी चाहिए | (199)   एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुर्नैव मन्यते | श्वनयोनिशतं गत्वा चाण्डालेष्वपि जायते ||   एकाक्षर मंत्र का उपदेश करनेवाले को जो गुरु नहीं मानता वह सौ जन्मों में कुत्ता होकर फिर चाण्डाल की योनि में जन्म लेता है | (200)   गुरुत्यागाद् भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्यरिद्रता | गुरुमंत्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत् ||   गुरु का त्याग करने से मृत्यु होती है | मंत्र को छोड़ने से दरिद्रता आती है और गुरु एवं मंत्र दोनों का त्याग करने से रौरव नरक मिलता है | (201)   शिवक्रोधाद् गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि | तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लंघयेत् ||   शिव के क्रोध से गुरुदेव रक्षण करते हैं लेकिन गुरुदेव के क्रोध से शिवजी रक्षण नहीं करते | अतः सब प्रयत्न से गुरुदेव की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए | (202)   सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रंशकारकाः | एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम् ||   सात करोड़ महामंत्र विद्यमान हैं | वे सब चित्त को भ्रमित करनेवाले हैं | गुरु नाम का दो अक्षरवाला मंत्र एक ही महामंत्र है | (203)   न मृषा स्यादियं देवि मदुक्तिः सत्यरूपिणि | गुरुगीतासमं स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतले ||   हे देवी ! मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा | वह सत्यस्वरूप है | इस पृथ्वी पर गुरुगीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है | (204)   गुरुगीतामिमां देवि भवदुःखविनाशिनीम् | गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचित् ||   भवदुःख का नाश करनेवाली इस गुरुगीता का पाठ गुरुदीक्षाविहीन मनुष्य के आगे कभी नहीं करना चाहिए | (205)   रहस्यमत्यन्तरहस्यमेतन्न पापिना लभ्यमिदं महेश्वरि | अनेकजन्मार्जितपुण्यपाकाद् गुरोस्तु तत्वं लभते मनुष्यः ||   हे महेश्वरी ! यह रहस्य अत्यंत गुप्त रहस्य है | पापियों को वह नहीं मिलता | अनेक जन्मों के किये हुए पुण्य के परिपाक से ही मनुष्य गुरुतत्व को प्राप्त कर सकता है | (206)   सर्वतीर्थवगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः | गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन् ||   श्री सदगुरु के चरणामृत का पान करने से और उसे मस्तक पर धारण करने से मनुष्य सर्व तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है | (207)   गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम् | गुरुर्मूर्ते सदा ध्यानं गुरोर्नाम्नः सदा जपः ||   गुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिए, गुरुदेव के भोजन में से बचा हुआ खाना, गुरुदेव की मूर्ति का ध्यान करना और गुरुनाम का जप करना चाहिए | (208)   गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्  | गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद् गुरुम् ||   ब्रह्मा, विष्णु, शिव सहित समग्र जगत गुरुदेव में समाविष्ट है | गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है, इसलिए गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए | (209)   ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः | गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम् ||   गुरुदेव के प्रति (अनन्य) भक्ति से ज्ञान के बिना भी मोक्षपद मिलता है | गुरु के मार्ग पर चलनेवालों के लिए गुरुदेव के समान अन्य कोई साधन नहीं है | (210)   गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्मविष्णुशिवादयः | सामर्थ्यमभजन् सर्वे सृष्टिस्थित्यंतकर्मणि ||   गुरु के कृपाप्रसाद से ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव यथाक्रम जगत की सृष्टि, स्थिति और लय करने का सामर्थ्य प्राप्त करते हैं | (211)   मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् | स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ||   हे देवी ! गुरु यह दो अक्षरवाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है | स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का वह सार ही है, इसमें संशय नहीं है | (212)   यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च | इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ||   मैं ही सब हूँ, मुझमें ही सब कल्पित है, ऐसा ज्ञान जिनकी कृपा से हुआ है ऐसे आत्मस्वरूप श्री सद्गुरुदेव के चरणकमलों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ | (213)   अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः | ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो ||   हे प्रभो ! अज्ञानरूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्तवाले मुझको ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो | (214)   || इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां तृतीयोऽध्यायः ||    

Monday, 23 October 2017

सभी गुरुओं के दीक्षा मंत्र

(Rampal ye 7 Nam deta h...

1 सत सुकृत अविगत कबीर
2 ॐ ॐ ॐ ॐ
3 हरियम हरियम हरियम हरियम
4 श्रीयम श्रीयम श्रीयम श्रीयम
5 किलियम किलियम किलियम किलियम
6 सोहम सोहम सोहम सोहम
7 सत्यम सत्यम सत्यम सत्यम)
सावधान !!!
राधास्वामी पंथ में
पाँच नाम मन्त्र देते हैं -
ज्योति निरंजन, ओंकार,
रंरंकार, सोहं और
सतनाम |
इसी पंथ की शाखा धन-
धन सतगुरू-
सच्चा सौदा सिरसा वाले
अब तीन नाम मन्त्र
1. सतपुरूष
2. अकाल मूर्ति
3. शब्द स्वरूपी राम
तथा जगमालवाली वाले
‘‘धन-धन सतगुरू
तेरा ही आसरा’’ एक
नाम मन्त्र देते हैं, पहले
पांच नाम मन्त्र
ही दान किए जाते थे।
दिनोंद
(जिला भिवानी)
हरियाणा में
श्री ताराचन्द
जी वाले पंथ एक
‘‘राधा स्वामी’’ नाम
का मन्त्र देते हैँ
इसी को सारनाम
बताते हैँ |
श्री आसाराम बापू
(अहमदाबाद वाले) सोहं
मन्त्र को दो भागों में
स्मरण करने को कहते हैँ
तथा कई अन्य मन्त्र
भी देते हैँ। जिन में से
रूची अनुसार साधक
को स्वयं
चुनना होता है।
1. गायत्री मन्त्र (ओम्
भूर्भुवः ------)
2. ओम् नमः शिवाय
3. ओम् नमः भगवते
वासुदेवाय
4.------ इत्यादि अनेक
नाम मन्त्र दिए जाते है
|
श्री सुधांशु
जी (बकरवाला दिल्ली वाले)
हरि ओम्-तत्-सत्
का जाप मन्त्र देते हैँ।
श्री शिव भगवान
को अजन्मा-अजर-अमर
अर्थात् मृत्युंज्य
तथा सर्वेश्वर
आदि बताते हैं । जब
कि श्री देवी महापुराण
तथा शिव महापुराण में
श्री शिव का जन्म मृत्यु
लिखा है ।
“निरंकारी” पंथ वाले
एक नाम मंत्र
“ तू ही एक निरंकार। मैं
तेरी शरण मुझे बख्स लो”
देते हैं
तथा परमात्मा को निराकार
बताते हैं।
जबकि परमात्मा सशरीर
है।
उपरोक्त मन्त्र शास्त्र
विरूद्ध होने से मोक्ष
दायक नहीं हैं।
‘‘हंसा देश
पंथ’’ (श्री सतपाल
जी महाराज
पंजाबी बाग
दिल्ली वाले
तथा श्री प्रेम रावत
उर्फ बालयोगेश्वर
जी महरौली दिल्ली वाले)
“हंस” का जाप
दो हिस्से करके जाप
करने को देते हैं।
इसको उल्टा करके सहं
करके सोहं
को भी दो हिस्से करके
जाप करने को देते है
तथा आँख बन्द करके हठ
योग क्रियाऐं देते हैं
जो शास्त्रविरूद्ध हैं
मोक्ष दायक नहीं हैं।
भावार्थ है कि ओम्-तत्
(सांकेतिक) तथा सत्
(सांकेतिक) के अतिरिक्त
सर्व साधना शास्त्र
विरूद्ध अर्थात्
मनमाना आचरण (पूजा)
है। जो पवित्र
गीता अध्याय 16 श्लोक
(मन्त्र) 23 में व्यर्थ
कहा है तथा (श्लोक)
मन्त्र 24 में कहा है
कि परमात्मा की भक्ति के
लिए शास्त्रों(वेदों)
को ही आधार मानें।
इनके (गीता , वेदोँ )
अलावा की गई
साधना शास्त्र विरूद्ध
है, मोक्ष दायक नहीं है।
साभार :: - जगतगुरु
तत्वदर्शी संत रामपाल
जी महाराज जी
_/\_
जय बंदीछोड़ की
सत साहेब
बस......
धुन और स्वरूप भी खोल देते !

शब्द बिना सुति नैनहिन, कहाँ किधर वो जाए |  द्वार न पावे शब्द का, यहाँ वहाँ धक्के खाए ||  गुरू गुरू में भेद है, भिन्न भिन्न है स्वभाव |  गुरू सदा ऐसा मानो जो, जाने शब्द प्रभाव ||  शब्द शब्द भिन्न होते हैं, सार शब्द समझ लीजिए |  कहे कबीर बिन सार शब्द, जीवन व्यर्थ नहीं कीजिए ||  बन्दगी करूँ विवेक की, भेष धरे हर कोई |  वहाँ बन्दगी व्यर्थ है, जहाँ शब्द विवेक न होई ||  मानुष देही पाय के, चुका जो इस बार |  जाए पडा भवचक्र में, वो होगा कभी न पार ||
मानव का उधार इसी मे है की वे अपने गुरु पर अटुट विश्वास करे नाम ही गुरु मंत्र है जय हो महा शक्तीओ की
sabad ko guru kijiye sabad milave rupako ( saheb bandgi saheb)

Saturday, 21 October 2017

#Gyan

(पूर्णश्रद्धा, धैर्य और शरणागति निष्काम प्रेम से सर्वश्रेष्ठ ईश्वर प्राप्ती होती हैं।)
(निष्काम कर्म निष्काम भक्ति से ज्ञान की शरणागति ही श्रेष्ठ भक्तिकर्म ज्ञान हैं)
तन,मन और स्त्री को वश में रखना चाहिए
(शस्त्र, शत्रु और अग्नि से संभव कर रहना चाहिए)
*शान्तितुल्यं तपो नास्ति*
           *न संतोषात्परं सुखम्*।
*न तृष्णया: परो व्याधिर्न*
           *च धर्मो दया परा:*।।

    शान्ति के समान कोई तप नही है, संतोष से श्रेष्ठ कोई सुख नही, तृष्णा से बढकर कोई रोग नही और दया से बढकर कोई धर्म नहीं।
  
         *🙏💐सुप्रभातम्💐🙏*
        *आपका दिन  मंगलमय हो।।*
भज सेवायाम् + क्तिन् + सु= भक्ति:।
कर्तव्य कर्म ही ब्रह्म है।
जिस प्रकार सूर्य-चंद्रादी देव निष्काम भाव से निहीत कर्त्तव्यकर्म कर रहे हैं वह भी बिना प्रश्न के वह भी प्रत्यक्ष ब्रह्म का प्रमाण है। कर्त्तव्यकर्म ही सत-चित-आनन्द/सर्वदा एक सा रहने वाला नित्य/अद्वैत आदि हैं।
*आत्मा का शरीर से,* 
       *निकल जाना मुक्ति नहीं है,*

बल्कि सांसों के चलते मन से,
       इच्छाओं का निकल जाना ही

*मुक्ति एवं मोक्ष है..!!!*

*जिस घर में अंधेरा हो , चोर वहीं सेंध लगाते हैं। यदि घर में निरंतर प्रकाश रहे तो चोर उस घर में घुसने का भी साहस नहीं करते।*
*नाम की ज्योति सर्वदा अपने अन्तः करण में ज्वलंत रखनी होगी, फिर काम, क्रोध,लोभ आदि पाँच चोर हमारे पास नहीं आयेंगे।।*
श्री महाकाल कृपा 🔱🔔*

*जिदंगी मे दो शब्द बहुत खास है:*
-* *प्रेम और ध्यान।*
*क्योंकि ये अस्तित्व के मंदिर के दो विराट दरवाजे हैं।*
*एक का नाम प्रेम, एक का नाम ध्यान।*
*चाहो तो प्रेम से प्रवेश कर जाओ, चाहो तो ध्यान से प्रवेश कर जाओ।*
*शर्त एक ही हैः अहंकार दोनों में छोड़ना होता है।*

Thursday, 19 October 2017

सप्तश्लोकीगोरक्षगीता

सप्त श्लोकी गोरक्ष गीता

वेदा न लोका न सुरा न यज्ञा वर्णाश्रमो नैव कुलं न जाति
न धूम्र मार्गों न च दीप्त मार्गों ब्रह्मैक रूपं परमार्द तत्वम् ।।1।।

मूर्खोSपि नाहं न च पण्डितोЅहं मौनं च वार्ता न  मे कदाचित् ।
वितर्क तर्क च कथं वदामि स्वरूप निर्वाण मना मयोहम् ।।2।।

न ते माता च पिता न बन्धुर्नते च पत्नी न च शत्रु मित्राः ।
न पक्षपातो न विपक्षपातः कथं हि तृप्तो न च काम कामी ।।3।।

जितेन्द्रियोहं न जितेन्द्रियोहः न च संयमो मे नियमो न जातिः ।
त्वया मयायत्र कथं वदामि वयं स्वरूप निर्वाण मना मयोहम् ।।4।।

शिवं न जानामि कथं वदामि वयं शिवश्च परमार्थ तत्वम् ।
सत्य स्वभावो गगनोप मोहं ज्ञानामृतं शुद्ध मतीन्द्रियोहम् ।।5।।

अतत्व रूपं नहि वस्तु किंचित् तत्व स्वरूपं नहि वस्तु किंचित् ।
आत्म स्वरूपं परमार्थ तत्वं न हिंसको वापि न चापि शुद्धम् ।।6।।

षडग्ङ योगो न च नैव शुद्धं गुरूपदेशे न च नैव शुद्धम् ।
मनोविनाशाय च नैश शुद्धं वयं तत्वं वयं मेव शुद्धम् ।।7।।
                 ।। इति सम्पूर्णं।।

गीता सप्तश्लोक

 Astroprabha सप्तश्लोकी गीता  Chander Prabha 5 महीना ago Advertisements   ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देह स याति परमां गतिम्।।1।। स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा:।।2।। सर्वत:पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् । सर्वत:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।3।। कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमस: परस्तान्।।4।। ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।5।। सर्वस्य चहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।6।। मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:।।7।। इति श्रीमद्भागवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्ण । Advertisements  श्रेणियाँ: Dharm, Dharma, hindu God, hindu goddess, Indian Mytology, mantra, path, Remedy, Stuti, vandana टैग्स: Sapta Shaloki Geeta, Sapta Shloki Bhagvat Geeta, Sapta Shloki Geeta, Sapta Shloki Gita, Sapta Sloki Geeta, Saptashaloki Geeta, Saptashloki Bhagvat Gita, Saptha Shloki Geeta, Saptha Sloki Gita, Sapthashloki Gita Astroprabha WordPress.com पर ब्लॉग. Back to top